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रविवार, 26 सितंबर 2010


कुदरत के कहर से कांप रहा हिमालय

कुदरत के कहर से हिमालयी राज्य कराह रहे हैं। देश पर हमेशा उपकार करने वाला हिमालय आज जार जार रो रहा है। अगस्त की शुरूआत में लेह में बादल फटने की घटना के साथ शुरू हुआ प्रकृति का प्रकोप उत्तराखंड के सुमगढ़ में 18 बच्चों को निगलने के बावजूद शांत नहीं हुआ। समाचार पत्रों के पहले पेज लाशों से पटे पड़े हैं। भीतर के पेजों में मलबे में दबे शवों को खोजने के लिए तलाशी अभियान जारी है। अस्पतालों में बेसुध पड़ी मां है। पिता की गोद में खून से लतपथ बच्चे हैं। प्रकृति के इस प्रकोप के आगे हिमालय बेवस खड़ा है।
गौरतलब है कि बादल फटने की दुर्घटना ने बीते पांच अगस्त को लेह में 200 से अधिक लोगों को लील लिया था। हजारों लोग बेघर हो गए, सैकड़ों का अब तक कोई पता नहीं लगा। माल, मवेशियों को भी अपने साथ बहाने वाली यह बाढ़ वहीं नहीं रूकी। इससे आगे बढ़कर इसने उत्तराखंड में भी भारी तबाही मचाई। लगातार गिर रहे पानी और मलबे से उत्तराखंड देश से अलगथलग पड़ गया है। अल्मोड़ा के देवली और बाड़ी गांव में बादल फटने से कई लोग लापता हैं। 35 से अधिक शव निकाले जा चुके हैं। तलाशी अभियान जारी है। डरे-सहमे लोग सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। अल्मोड़ा में ही अब तक 600 से अधिक परिवार सुरक्षित स्थानों पर पहुंच चुके हैं। गांव और आसपास के क्षेत्रों में धर्मशालाएं, स्कूल और पंचायतघर सब शराणार्थियों से भरे पड़े हैं। इस त्राशदी के बाद सरकारी तंत्र भी हमेशा की तरह चुपचाप मुआवजे की घोषणा में जुट गया है। केंद्र सरकार ने भी सुमगढ़ में राहत और मुआवजे की राशि बांट दी है। उम्मीद है जल्द अल्मोड़ा में मारे गए लोगों के लिए भी घोषणा कर दी जाएगी। हिमाचल में सतलुज नदी ने आफत मचा रखी है। 2005 में भी इस नदी ने व्यापक तबाही मचाई थी। तब तिब्बत से निकलने वाली पारछू नदी पर बनी अप्राकृतिक झील के टूटने से हिमाचल को 800 करोड़ रूपये की संपत्ति का नुकसान हुआ था। अंबाला में टांगरी तो हरियाणा में यमुना ने लोगों को दहशत में डाल रखा है। उधर, जम्मू-कशमीर अपनी आग में जल रहा है।
यह त्राशदी हिमालयी राज्यों के लिए नई नहीं है। बस यह जख्म नया है। हिमालय में बसने वाले लोग तो हमेशा ही सताए गए हैं। कभी प्रकृति ने उन्हें मारा तो कभी शासकों के शोषण का शिकार हुए। इसके विपरीत हिमालय से भारत को मिलने वाले उपकारों का कोई सानी नहीं है। प्राचनीकाल में जब मानववंश संगठित हुआ तो हिमालय ने उसे खेती करने के लिए पानी दिया, नहरें दी, और धर्म के रूप में बहुत बड़ी मूल्य प्रणाली दी। इस पर आज भी हम गर्व करते हैं। भगीरथ का गंगा को धरती पर लाना धार्मिक और आर्थिक दोनों उद्ेश्यों के लिए था। इस घटना ने मुख्यधारा के आर्यों को संपन्न और सुसंस्कृत भी बनाया। इसके बदले हिमालय को मिली केवल बेबसी। मध्ययुग के मुगल काल में भी गंगा-यमुना ने मुगलों को संपन्नता दी लेकिन मुगलों ने हिमालय को केवल लूटा ही। अंग्रेजों ने हिमालय वासियों के वनों पर नजर दौड़ाई और उनकी सारी संपन्नता का अपने लिए उपयोग किया। इसके बाद आजादी आई तो हिमालय के वाशिंदों में भी सम्मान से जीने की एक आश जागी। देश में हरित क्रांति, श्वते क्रांति और नीली क्रांति सब में ही हिमालय ने ही जान फूंकी। यहां भी हिमालय वासी ठगे गए। हिमालय के संसाधनों का उपयोग कर इससे पोषित कई राज्य आगे बढ़ते रहे लेकिन हिमालय केवल उपकार ही करता रहा।
इसके बाद सबसे बड़ा धोखा हुआ बांधों के रूप में। सदानीर नदियों को सुरंगों में डालकर पर्यावरण के साथ जबरदस्त खिलवाड़ किया गया। उत्तराखंड के ऐतिहासिक नगर टिहरी को बांध निगल गया। आज यही टिहरी बांध खौफ का सबसे बड़ा कारण बन गया है। लगातार बढ़ रहे जलस्तर से अब राज्य सरकार भी दहशत में है। वह अपने वरिष्ठ नेताओं से मदद की गुहार लगा रही है। सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री को तो भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गृहमंत्री को टिहरी बांध में बढ़ रहे जलस्तर के खतरे को लेकर चेताया है। उत्तरप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इस बांध से छोड़े गए पानी ने तबाही शुरू कर दी है। हिमालय में करोड़ों रूपये का बिजली भंडार होने के दावा करने वाली केंद्र और राज्य की सरकारें अब घबराने लगी है। खौफ लोगों के मरने का नहीं है। डर है नुकसान का। आगे की योजनाओं का। डर है उस झूठ की पोल खुल जाने का जिसमें हिमालय को संपन्नता के झूठे सपने दिखाए गए थे। इतने झूठों के बावजूद हिमालय खड़ा है उपकार करने के लिए। हालांकि इसकी श्रृखलाओं के कुछ पहाड़ साल दर साल दरक रहे हैं। अब यदि हिमालय के साथ लूटपाट बंद नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं जब हमेशा उपकार करने वाले हिमालय का रौद्र रूप हमारे सामने होगा। इसका खामियाजा हिमालय के वासियों के साथ ही अब तक इसे लूट रहे लोगों को भी भोगना होगा।

यह लेख 25 सितंबर के कांपेक्ट के संपादकीय में छपा है।

शनिवार, 25 सितंबर 2010

क्वीरीजिमियां उजड़ गया पर हम क्या कर सकते हैं

मुनस्यारी का क्वीरीजिमियां गांव अब कभी आबाद नहीं होगा। इस बार दीपावली में दिया जलाने शायद वहां कोई नहीं जाए। कुदरत के कहर ने क्वीरीजिमियां को कहीं का नहीं छोड़ा। 36 परिवारों के छोटे से घर जैसे इस गांव के आंगन में अब जानवर कभी मैं-भैं नहीं करेंगे। एडवेंचर के लिए जाने वाले पर्यटकों को अब खेतों में डोका लिए जाने वाली महिलाएं, ग्वाले जाते किशोर, नीली कमीज, खाखी पैंट में स्कूल जाते बच्चे इस गांव में नहीं दिखेंगे। कल तक खतरों के बीच हंसता-खेलता यह गांव इतनी जल्दी खाली होगा सोचा नहीं था।
क्वीरीजिमियां के लोग अभी आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से लगाए गए टैंटों में रह रहे हैं। प्रशासन की यह कृपा कब तक रहेगी कहा नहीं जा सकता। क्योंकि यह तो परंपरा है कि जिस पर आई है भाई वही झेलेगा। टैंट उठने के बाद क्वीरीजिमियां वाले कहां जाएंगे। इसका खुद क्वीरीजिमियां वालों को पता नहीं। मुख्यमंत्री ने चालाकी से गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी हैं। मतलब सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। सीएम ने स्पष्ट बता दिया है कि हमारे पास कोई जमीन नहीं हैं। वन भूमि के लिए केंद्र से बात की जाएगी। उत्तराखंड के अलग से पुनर्वास नीति बनेगी। अब देश में नीति बनने में कितना समय लगता है भाई यह तो देश का प्रत्येक बेवकूफ आदमी जानता है। खैर जो भी दुखी न हों पहाड़ों में तो यह चलता रहता है। टिहरी उजड़ गया क्वीरीजिमियां की क्या औकात है। और हम कर भी क्या सकते हैं। हमारा भी तो परिवार है भाई नौकरी करनी है। क्वीरीजिमियां तो और भी बहुत हैं यहां।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

सोमवार, 20 सितंबर 2010

पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माँ नन्दा देवी
उत्तराखण्ड में नन्दा देवी पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल है जहाँ नन्दा ना केवल सुपूजित देवी है बल्कि आनन्द देने वाली कत्यूरों की कुलदेवी भी है। यह उत्सव भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को नैनीताल, चम्पावत, अल्मोड़ा, रानीखेत, द्वाराहाट, भवाली, चमोली एवं गोपेश्वर में आयोजित होता है तथा कोट की माई में भी यह होता है। इसी तरह नन्दा से जुड़ी नन्दा जात उत्तराखण्ड में प्रत्येक 12 वर्षों में नौटी तथा गोपेश्वर के मध्य आयोजित होती है।
राजा बाज बहादुर चन्द्र (सन् 1638-1678) ने एक बार गढ़वाल के बधानगढ़ व लोहनागढ़ पर चढ़ाई की तथा जूनागढ़ का किला जीता। यहाँ से वे नन्दा को मय टहलुओं के अल्मोड़ा ले आये तथा मल्ला महल में स्थापित किया। बाजबहादुर चंद के पुत्र उद्योतचन्द्र द्वारा 1680 में अल्मोड़े का वर्तमान मंदिर बनाया गया तथा 1699 में राजा ज्ञानचन्द्र के द्वारा मूर्ति स्थापित की गयी जिसे वर्तमान स्थल पर कमिशन ट्रेल (1815-1841) ने उद्योतचंदेश्वर मंदिर परिसर में रखा।
रणचण्डी नन्दा का मूल निवास हिम शिखर नन्दा देवी ही है। इसी से नन्दाकिनी नदी निकलती है तथा नन्दाकोट पर्वत इसका दरबार है। जब से मनुष्य इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ तभी से वह पेड़ पौधों पर निर्भर रहा है। लोक जीवन, रीति-रिवाज, पेड़-पोधों एवं मनुष्यों का आपसी संबंध ही लोक वनस्पति विज्ञान है। लोक साहित्य में उस क्षेत्र की महत्वपूर्ण जानकारियाँ होती है जैसे कुमाऊँनी के पर्वों में त्यौहारों, जात्राओं, व्रतों, सांस्कृतिक समारोह, संस्कारों, धार्मिक अनुष्ठानों में भी प्रकृति, वनस्पति व पेड़-पौधों के रूप में उस स्थान की संस्कृति, जलवायु तथा परम्परायें दर्शाती रहती हैं। न्यौली, चाँचरी में प्रकृति का वर्णन है तो सोलह संस्कारों में विशेष वनस्पतियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं। किसी क्षेत्र विशेष में निवास करने वाला मानव समूह अपने क्रिया कलापों को वहाँ के पर्यावरण के अनुसार ही न सिर्फ निर्धारित करता है बल्कि विकसित भी करता है। ये क्रिया कला ही एक विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप की संरचना करते हैं। संस्कृति में ही जीव जन्तुओं तथा वनस्पतियों की पूजा का विधान है।
पर्यावरणीय क्रम में माँ नन्दा देवी महोत्सव का प्रारम्भ मूर्ति निर्माण से होता है जिसके लिए दो कदली वृक्ष गाँवों से लाये जाते हैं कदली ;डनें चंतंकपेपंबंद्ध आधार क्रम है जिसमें बाँस ;ठंउइनें ेचण्द्ध की खपच्चियाँ प्रयुक्त की जाती हैं तथा रूई ;ळवेेलचपनउ ंतइवतमनउद्ध की पैंडिंग की जाती है तथा पीले वस्त्रों ;ळवेेलचपनउ इंतइमकमदेमद्ध कपास को सिया जाता है और रंगों से भव्यता तथा आभूषण से श्रृंगार किया जाता है तथा इन दोनों मूर्तियों को पाती ;।तजमउपेपं अनसहंतपेद्ध के कुशन में रखा जाता है तथा डहेलिया ;क्ंीसपंद्ध के पुष्प माला से डोला सजाया जाता है और मंत्रोच्चार से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है और डोला भ्रमण के साथ विदाई की जाती है।
प्रकृति की वनस्पतियों में कदली पवित्र है तथा भगवान विष्णु का प्रतीक एवं लक्ष्मी का वास तथा इसका फल नैवेध है। बाँस को शुद्ध माना गया है तथा इसके कई प्रयोग हैं। रूई जो शुद्ध है तथा कपड़ा इसी से बनता है जबकि पाती अर्थात् पवित्र पत्तियों वाला औषधीय पौधा है तथा पूजा पात्रों में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रकार हम प्रकृति के विभिन्न रूपों की वनस्पतियों को प्राण रूप देकर पूजते हैं तथा इन्हें जल में विदा करते हैं क्योंकि ये गलनशील है। इसमें भी महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि श्री राम सेवक सभा नैनीताल द्वारा जब पंचमी के रोज कदली के वृक्ष लाये जाते हैं उसी गाँव में 21 फलदार पौधे जलवायु अनुकूल लगाये जाते हैं जो जनचेतना का परिचायक है कि पर्यावरण संरक्षित रखना है।
चाहे गढ़वाल की मैती परम्परा हो चाहे चिपको या नवम्पत्ति द्वारा पौधारोपण या बच्चे के नामकरण पर पौध रोपण ये प्रकृति के पर्यावरण पर मानवीय दृष्टिकोण दर्शाते हैं। श्री नन्दा देवी महोत्सव में लाल वस्त्रों का अधिक प्रयोग होता है जो प्रेम, उत्साह, प्रसन्नता, वीरता एवं आभा का प्रतीक है जो बरसात के मौसम के पश्चात मानव को उत्साहित करते हैं जबकि सफेद रंग के झण्डे का अर्थ है पवित्रता, स्पष्टता, स्वच्छता, शान्ति तथा एकता। नैनीताल में यह 1903 से स्व0 मोती राम साह द्वारा आरम्भ किया गया तथा 1926 से श्री राम सेवक सभा इसे कराती है। 1992 से वृक्षारोपण का कार्य प्रारम्भ किया गया।
उत्तराखण्ड की संस्कृति संरक्षण व संवर्धन नीति का मिश्रण है जिसमें उसने पर्यावरण के साथ मधुर संबंध रखकर अपने आपको पर्यावरण का एक घटक माना है ना कि पर्यावरण को अपने उपभोग का घटक। इसीलिए पर्यावरण का उपयोग स्नेह व सम्मान से किया जाता है किन्तु वर्तमान में विकास समाज की आवश्यकता है ऐसे में परिवर्तन निश्चित है तथा संस्कृति का स्वाभाविक रूप से उसके परम्परागत क्रिया कलापों व परिवर्धन होना निश्चित है किन्तु पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए।

डॉ0 ललित तिवारी
उपाचार्य, वनस्पति विज्ञान
कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल

शनिवार, 18 सितंबर 2010

गरीबी उसे निगल गई
आफिस के गेट से फोन आया था। गेट पर पहुंचा तो पता चला कि गार्ड राजेंद्र गोस्वमी की बेटी की तबियत खराब है। राजेंद्र की आंखें डबडबाई हुई थीं। वह कुछ भी बोलने में असमर्थ था। साथ में ही काम करने वाले विजेंद्र जी ने मुझसे कहा कि राजीव तुम इसे अस्पताल छोड़ दो इसकी बच्ची की तबियत खराब है। मैं तैयार हो गया और सोचा कि अस्पताल छोड़ते हुए घर की ओर निकल लूंगा। इसके बाद हम सीधे गोस्वामी के घर चले गए और उसकी बच्ची को ले आए। बच्ची बहुत समझदार थी चुपचाप वह हमारे साथ बाइक पर बैठ गई। मुझे पता नहीं था कि घर से यह उसकी अंतिम यात्रा है और इसका चालक मैं हूं। अस्पताल पहुंचने पर मासूम अंजू की पीड़ा और एक गरीब बाप की बेवसी का अंदाजा मुझे हुआ। दुर्योग से आज मैं भी बिना पर्स लिए ही आफिस चला गया था। गोस्वामी के पास भी पैसे नहीं थे। अंजू इमरजेंसी वार्ड में भर्ती हो चुकी थी। चिकित्सक देख रहे थे और दवाएं लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। सबसे पहले पर्चा बनाना पड़ा और मेरी जेब में पांच रूपये तक नहीं थे। गोस्वामी से मैंने किसी तरह हिम्मत कर पांच रूपये मांगे। पर्चा बन गया। इसके बाद डाक्टर साहब ने दवा लिखी। अब फिर पैसे की जरूरत थी। गोस्वामी से मैंने फिर पैसे मांगे तो उसने अपनी पूरी जेब खाली कर ढाई सौ रूपये निकाले। यह रूपये भी एक बार की ही दवा में खर्च हो गए। इसके बाद डाक्टर ने कुछ इंजेक्शन लिख दिए इनकी कीमत करीब 694 रूपये थी। अब धर्मसंकट यह था कि मैं गोस्वामी से पैसे नहीं मांग सकता था। स्थिति यह थी मैं पैसे लेने घर नहीं जा सकता था। मैंने कार्यालय में ही अपने एक मित्र को फोन कर बुलाया और हजार रूपये लाने की बात कही। इसके बाद में बीस मिनट तक इमरजेंसी वार्ड के बाहर ही अपने इस कथित मित्र का इंतजार करता रहा पर वह नहीं आया। इस बीच गोस्वामी बड़ी तेजी से बाहर निकलकर आया और बोला पांडेजी जल्दी दवा ले आओ। मैं बिना कुछ सोचे दवा की दुकान की और दौड़ा और पर्चा दुकानदार को थमा दिया। दवा का बिल बनने तक मैंने उसे पैसे न होने की बात नहीं बताई। दवा का बिल बन चुका था। अब दुकानदार के आगे गिड़गिड़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। मैंने उसे अपना परिचय दिया तो वह मुझसे मेरा प्रेस कार्ड मांगने लगा। कार्ड पर्स के साथ ही घर छूट गया था। अब मेरे पास दो विकल्प थे एक मेरी गाड़ी की चाबी और दूसरा मेरा मोबाइल मैंने दोनों ही चीज दुकानदार की ओर बढ़ा दीं। मैं बोला आप दवा दे दीजिए आपके पैसे सुबह मिल जाएंगे। तब तक आप इसमें से जो चाहें वह रख लें। दुकानदार ने मानवीयता का परिचय देते हुए मेरा फोन नंबर लिया और मुझको दवाएं उधार दे दीं। इसके बाद मैं करीब दो हजार रूपये की दवाएं और उधार लेकर आया। गोस्वामी की घबराहट कम नहीं हुई थी। इसी बीच एक डाक्टर ने मुझे बुलाया और बताया कि बच्ची की हालत बहुत खराब है। उसका हार्ट बुरी तरह से फेल हो चुका है। यह बात मैं गोस्वामी को बता नहीं सकता था। मैंने तुरंत विजेंद्र जी को फोन कर स्थिति बताई और वह अस्पताल पहुंच गए। विजेंद्र जी की चिकित्सकों से बात हुई तो पता चला कि वेंटीलेटर में बच्ची को रखना पड़ेगा। इसकी एक दिन की ही फीस करीब 10 हजार रूपये से अधिक थी। गोस्वामी को यह बात बताई गई तो वह मुझसे बोलने लगा पांडे जी कुछ भी करो यार मेरी बच्ची को बचा लो। उसकी बेवसी के आगे मैं भी बेवस था। विजंेद्र जी ने उसे हिम्मत बंधाई, उन्होंने कहा कि कुछ पैसे का इंतजाम तुम करो कुछ का हम करेंगे। इस बात से गोस्वामी का हौसला बढ़ा और हम उसकी बेटी को वेंटीलेटर में रखने के लिए एक निजी चिकित्सालय ले गए। स्थिति थोड़ी सामान्य हुई। दौड़भाग में ही रात पूरी खत्म हो चुकी थी। दूसरे दिन उठा तो विजेंद्र जी ने बताया कि बच्ची की ब्लड रिपोर्ट आ गई है। उसे बचाना है तो हायर सेंटर ले जाना होगा। मैं विजंेद्र जी पर हंस पड़ा और बोला भाईसाहब वेंटीलटर में रखना तो मुश्किल हो गया आप हायर सेंटर की बात करते हैं। विजेंद्र जी ने गोस्वामी की सबसे अधिक मदद की थी अब वह इंसान भी बिल्कुल असहाय था। गोस्वामी को सबने राय दी की वह अपनी बच्ची को फिर उसी अस्पताल में ले आए जहां से उसे रेफर किया था। अंत में ऐसा ही हुआ। करीब 15 हजार रूपये निजी अस्पताल में लुटवाने के बाद अंजू फिर सरकारी अस्पताल पहुंच चुकी थी। गरीब बाप के पास बेटी की मौत का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था। मां को अंजू के ठीक होने की झूठी उम्मीद अब भी थी। मुझे विजेंद्र जी के फोन का इंतजार था। विजेंद्र जी का फोन आ ही गया। गोस्वामी की बेटी नहीं रही। गरीबी उसे निगल गई। इस समय में घर पर बैठकर टीवी देख रहा था। इसमें समाचार चल रहा था कि मुकेश अंबानी जल्द दुनिया के सबसे अमीर आदमी होंगे।

शनिवार, 12 जून 2010

खून से सनी सड़कें

राजीव पांडेय

देश में प्रत्येक दो दिन में मरने वाले तीन लोगों को तो नक्सलियों के खाते में डाल दिया गया है। जबकि उत्तराखंड में सड़क हादसों में ही रोज पांच लोगों की मौत हो रही है। इन्हें किसके खाते में डाला जाएगा। उत्तराखंड में तो सामूहिक मौतों का खेल वर्षों से जारी है। इन मौत या हत्याओं की जिमेदारी कौन लेगा। यह आज तक तय नहीं हो पाया है। हादसों का सफर कई सुहागिनों को हाथों की मेहंदी सूखने से पहले विधवा बना चुका है। कई पिता आज भी अपने कांधे पर बेटे की लाश का दर्द महसूस करते हैं। ऐसी माताओं की संया भी कम नहीं जो अपने लाल के जाने के बाद बेसुध पड़ी हैं। मासूमों की गिनती भी कम नहीं, जिनके माता-पिता छोटे से सफर में निकले थे पर आज तक नहीं लौटे।
उत्तराखंड में शायद ही कोई ऐसी सड़क हो जो खून से न सनी हो। पहाड़ की कई खाइयां हैं जहां से आज भी दर्दनाक चीख पुकार उठती हैं। अलकनंदा और रामगंगा जैसी कई जीवनदायनी नदियां इन मौतों की गवाह हैं। इन नदियों में ही न जाने आज तक कितने यात्री वाहन समा गए हैं। सड़क किनारे बसे गांव वाले आज भी जब किसी दुर्घटना का वृतांत सुनाते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते है। यह वह सवाल हैं जो न कभी विधानसभा में मुददा बने न जनता ने इनको लेकर बवाल काटा।
अब आंकड़ों में मौत का सफर तय करते हैं। अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं, २७ मई से अब तक रोज कम से कम पांच आदमी यहां सड़क दुर्घटनाओं में मारे जा रहे हैं। अकेले ३१ मई को ही १२ लोगों को पहाड़ की सड़कें लील गईं। दूर जाएंगे तो मंजर और भी भयावह दिखाई देगा। मई २००५ में अल्मोड़ा के पास हुई एक सड़क दुर्घटना को लोग अभी भूले नहीं हैं। इसमें २९ लोग मारे गए थे। इसमें बड़ी संया में यह युवा थे जो आईटीआई का प्रशिक्षण लेकर लौट रहे थे और आज तक घर नहीं पहुंचे। १७ जुलाई २००८ का दिन चंपावत वालों पर भारी पड़ा। पिथौरागढ़ से दिल्ली जा रही एक बस पर चंपावत के पास पहाड़ ही आ गिरा। इस दुर्घटना में १९ लोग दर्दनाक मौत मरे। १३ अक्तूबर २००८ को देवप्रयाग में लोगो ने मौत का तांडव देखा। एक बस दुर्घटना में २० लोग मौके पर ही मारे गए।
ऐसा नहीं कि इन सड़कों ने केवल अपनों को ही लीला हो। देवभूमि में चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु भी इसका शिकार हुए हैं। ११ अक्तूबर २००७ का दिन विष्णुप्रयाग के लोगों को भुलाए नहीं भूलता। इस दिन उड़ीसा के ४३ तीर्थायात्रियों से भरी एक बस बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा पर जा रही थी। लेकिन विष्णुप्रयाग पहुंचने से पहले ही बस अलकनंदा में समा गई। इसमें ४१ लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी। हालांकि भोलेनाथ ने अब तक कैलास मानसरोवर यात्रियों की रक्षा की है। लेकिन धारचूला से आगे मांगती तक का जो सफर है उसमें भोलेनाथ कब तक यात्रियों के साथ रहेंगे कहा नहीं जा सकता। ऐसा ही एक हादसा रीठा साहिब को जा रहे श्रद्धालुओं के साथ हुआ, जब एक ट्रक के खाई में गिर जाने से भी ११ लोगों मारे गए। यह सब तो उदाहरण हैं। विस्तार में तो लाशों का बड़ा ढेर है।
मौत का सफर तय करती इन सड़कों पर चलने वाले लोगों के बारे में कभी किसी ने सोचा हो याद नहीं आता। १९७६ में जरूर इसके लिए एक कमीशन बैठाया गया था। कमीशन ने उत्तराखंड की सड़कों में तकनीकी रूप से सैकड़ों कमियां निकालीं। कमियां आज भी यथावत हैं। लेकिन सड़क हादसों में मरने वाले लोगों की ही तरह इस जांच रिपोर्ट की भी मौत हो गई। इसी वर्ष यूपी केतत्कालीन मुयमंत्री एनडी तिवारी ने मीसा एक्ट लागू कर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई। इसका असर भी दिखा और तीन साल तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। लेकिन बिना संसाधनों केलागू किए गए कानून कितने कारगर होते हैं यह हमने दंतेवाड़ा के जंगलों में देख लिया है। इसलिए बेहतर होगा कि सड़कों पर दशकों से जारी इस मौत के सफर पर ब्रेक लगाने के लिए कोई कारगर पहल की जाए।

सोमवार, 10 मई 2010

आरती और सिमरन को न्याय चाहिए


आरती और सिमरन को न्याय चाहिए
आरती का दोषी सुरेंद्र कोली सिमरन का जन्मदाता

राजीव पांडेय
निठारी में नरपिशाचों का शिकार होकर छोटी सी उमर में जान गंवाने वाली आरती के साथ ही सिमरन को भी न्याय चाहिए। इन दोनों के एक ही कड़ी से जुड़े होने के बावजूद इनमें फर्क बस इतना है की निठारी का नरपिशाच सुरेंद्र कोली आरती का गुनहगार है तो सिमरन का जन्मदाता भी। सात साल में ही दुनिया से रुखसत हो चुकी मासूम आरती का मामला न्यायालय में विचाराधीन है तो करीब इतने ही बरस की सिमरन का फैसला जनता की आदलत में। कोली को १२ मई को सजा सुनाई जानी है। यह तय है कि कोली के अमानवीय कृत्य के लिए न्यायालय उसे जो भी सजा देगा वह कम ही होगी। इसी पटाक्षेप के बाद सिमरन का सवाल उठेगा और तब समाज को यह ध्यान रखना होगा की सिमरन केसाथ कोई अन्याय न हो क्योंकि वह अपने पिता के गुनाह से अंजान है।
अल्मोड़ा के मंगरूखाल गांव में अपने घर के आंगन में आज भी मासूम सिमरन निश्छल और तनावमुक्त होकर घूमती है। उसको आज भी पता नहीं कि जिन हाथों को पकड़कर उसने पहली डग भरी थी वह हाथ उसी की तरह न जाने कितने मासूमों के खून से रंगे थे। वह इससे भी अंजान है कि यदि आपने और हमने उसका साथ नहीं दिया तो आगे की डगर कितनी भयावह हो सकती है। वह तो आज भी अपने पिता के इंतजार में है। सिमरन केअपने व्यक्तिगत जीवन में इन वर्षों में कोई बदलाव नहीं आया। उसकी दिनचर्या आज भी उसी तरह है जैसी निठारी कांड से पहले हुआ करती थी। इस कांड के बाद शुरुआती झंझावतों के बीच कुछ दिन स्कूल छूटा जरूर लेकिन अब वह फिर स्कूल जाने लगी है। इस बीच उसका परिवार पूरी तरह दरक चुका है। उसकी मां शांति केजीवन में आज अपने नाम से मेल खाती कोई चीज नहीं है। चार साल का छोटा भाई अभावों के कारण आए दिन बीमार रहता है। इन दिनों टाइफाइड से ग्रसित है। दादी कुंती को आज भी अपनी कोख पर विश्वास नहीं होता। सुरेंद्र के कृत्य की सजा उसका परिवार भुगत रहा है। करीब १९ मामलों में हत्या और बलात्कार केआरोपी कोली को सजा देना कानून की जिम्मेदारी है। दो मामलों में वह दोषी ठहराया जा चुका है। कई फैसले आने अभी बाकी हैं। अब बात आती है कोली के परिवार जैसे उन सभी परिवारों की जो नाहक सजा काट रहे हैं। जो समाज में केवल इसलिए बहिष्कृत कर दिए गए हैं कि उनके अपनों ने कोई गुनाह किया है। तय किया जाना चाहिए कि कोली और उसके परिवार की ही तरह अपनों के कृत्य का दंश झेल रहे लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा। निर्णय होना चाहिए कि सिमरन और उसकी ही तरह अन्य मासूमों पर उनके बाप की काली छाया कभी नहीं पड़ेगी। ऐसे परिवारों से आने वाले बच्चों को भी बेहतर जिंदगी मिले। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आरती और सिमरन दोनों ही न्याय से वंचित रह जाएंगे। क्योंकि आरती भी सिमरन की ही तरह मासूम थी। इसलिए एक मासूम केसाथ हुए गुनाह कि सजा दूसरे मासूमों को नहीं मिलनी चाहिए। सिमरन को वह सब चीज मिलना चाहिए आरती को जो उसकेमाता-पिता देना चाहते थे बेहतर शिक्षा, बेहतर वातावरण और बेहतर भविष्य। इन पर सिमरन का आज भी उतना ही अधिकार है जितना सुरेंद्र केदोषी होने से पहले था। आरती का फैसला तो अदालत कर चुकी है। उसका गुनहागार दोषी ठहराया जा चुका है। १२ मई को उस नरभक्षी की सजा भी निर्धारित कर दी जाएगी। लेकिन सिमरन का मामला ताउम्र अब आपकी आदलत मेंं चलेगा बस ध्यान रहे कि कोई भी दलील नरपिशाच सुरेंद्र की वजह से इस मासूम के खिलाफ न जाए। यदि ऐसा हुआ तो यह समाज के न्याय पर एक धब्बा होगा।