गरीबी उसे निगल गई
आफिस के गेट से फोन आया था। गेट पर पहुंचा तो पता चला कि गार्ड राजेंद्र गोस्वमी की बेटी की तबियत खराब है। राजेंद्र की आंखें डबडबाई हुई थीं। वह कुछ भी बोलने में असमर्थ था। साथ में ही काम करने वाले विजेंद्र जी ने मुझसे कहा कि राजीव तुम इसे अस्पताल छोड़ दो इसकी बच्ची की तबियत खराब है। मैं तैयार हो गया और सोचा कि अस्पताल छोड़ते हुए घर की ओर निकल लूंगा। इसके बाद हम सीधे गोस्वामी के घर चले गए और उसकी बच्ची को ले आए। बच्ची बहुत समझदार थी चुपचाप वह हमारे साथ बाइक पर बैठ गई। मुझे पता नहीं था कि घर से यह उसकी अंतिम यात्रा है और इसका चालक मैं हूं। अस्पताल पहुंचने पर मासूम अंजू की पीड़ा और एक गरीब बाप की बेवसी का अंदाजा मुझे हुआ। दुर्योग से आज मैं भी बिना पर्स लिए ही आफिस चला गया था। गोस्वामी के पास भी पैसे नहीं थे। अंजू इमरजेंसी वार्ड में भर्ती हो चुकी थी। चिकित्सक देख रहे थे और दवाएं लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। सबसे पहले पर्चा बनाना पड़ा और मेरी जेब में पांच रूपये तक नहीं थे। गोस्वामी से मैंने किसी तरह हिम्मत कर पांच रूपये मांगे। पर्चा बन गया। इसके बाद डाक्टर साहब ने दवा लिखी। अब फिर पैसे की जरूरत थी। गोस्वामी से मैंने फिर पैसे मांगे तो उसने अपनी पूरी जेब खाली कर ढाई सौ रूपये निकाले। यह रूपये भी एक बार की ही दवा में खर्च हो गए। इसके बाद डाक्टर ने कुछ इंजेक्शन लिख दिए इनकी कीमत करीब 694 रूपये थी। अब धर्मसंकट यह था कि मैं गोस्वामी से पैसे नहीं मांग सकता था। स्थिति यह थी मैं पैसे लेने घर नहीं जा सकता था। मैंने कार्यालय में ही अपने एक मित्र को फोन कर बुलाया और हजार रूपये लाने की बात कही। इसके बाद में बीस मिनट तक इमरजेंसी वार्ड के बाहर ही अपने इस कथित मित्र का इंतजार करता रहा पर वह नहीं आया। इस बीच गोस्वामी बड़ी तेजी से बाहर निकलकर आया और बोला पांडेजी जल्दी दवा ले आओ। मैं बिना कुछ सोचे दवा की दुकान की और दौड़ा और पर्चा दुकानदार को थमा दिया। दवा का बिल बनने तक मैंने उसे पैसे न होने की बात नहीं बताई। दवा का बिल बन चुका था। अब दुकानदार के आगे गिड़गिड़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। मैंने उसे अपना परिचय दिया तो वह मुझसे मेरा प्रेस कार्ड मांगने लगा। कार्ड पर्स के साथ ही घर छूट गया था। अब मेरे पास दो विकल्प थे एक मेरी गाड़ी की चाबी और दूसरा मेरा मोबाइल मैंने दोनों ही चीज दुकानदार की ओर बढ़ा दीं। मैं बोला आप दवा दे दीजिए आपके पैसे सुबह मिल जाएंगे। तब तक आप इसमें से जो चाहें वह रख लें। दुकानदार ने मानवीयता का परिचय देते हुए मेरा फोन नंबर लिया और मुझको दवाएं उधार दे दीं। इसके बाद मैं करीब दो हजार रूपये की दवाएं और उधार लेकर आया। गोस्वामी की घबराहट कम नहीं हुई थी। इसी बीच एक डाक्टर ने मुझे बुलाया और बताया कि बच्ची की हालत बहुत खराब है। उसका हार्ट बुरी तरह से फेल हो चुका है। यह बात मैं गोस्वामी को बता नहीं सकता था। मैंने तुरंत विजेंद्र जी को फोन कर स्थिति बताई और वह अस्पताल पहुंच गए। विजेंद्र जी की चिकित्सकों से बात हुई तो पता चला कि वेंटीलेटर में बच्ची को रखना पड़ेगा। इसकी एक दिन की ही फीस करीब 10 हजार रूपये से अधिक थी। गोस्वामी को यह बात बताई गई तो वह मुझसे बोलने लगा पांडे जी कुछ भी करो यार मेरी बच्ची को बचा लो। उसकी बेवसी के आगे मैं भी बेवस था। विजंेद्र जी ने उसे हिम्मत बंधाई, उन्होंने कहा कि कुछ पैसे का इंतजाम तुम करो कुछ का हम करेंगे। इस बात से गोस्वामी का हौसला बढ़ा और हम उसकी बेटी को वेंटीलेटर में रखने के लिए एक निजी चिकित्सालय ले गए। स्थिति थोड़ी सामान्य हुई। दौड़भाग में ही रात पूरी खत्म हो चुकी थी। दूसरे दिन उठा तो विजेंद्र जी ने बताया कि बच्ची की ब्लड रिपोर्ट आ गई है। उसे बचाना है तो हायर सेंटर ले जाना होगा। मैं विजंेद्र जी पर हंस पड़ा और बोला भाईसाहब वेंटीलटर में रखना तो मुश्किल हो गया आप हायर सेंटर की बात करते हैं। विजेंद्र जी ने गोस्वामी की सबसे अधिक मदद की थी अब वह इंसान भी बिल्कुल असहाय था। गोस्वामी को सबने राय दी की वह अपनी बच्ची को फिर उसी अस्पताल में ले आए जहां से उसे रेफर किया था। अंत में ऐसा ही हुआ। करीब 15 हजार रूपये निजी अस्पताल में लुटवाने के बाद अंजू फिर सरकारी अस्पताल पहुंच चुकी थी। गरीब बाप के पास बेटी की मौत का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था। मां को अंजू के ठीक होने की झूठी उम्मीद अब भी थी। मुझे विजेंद्र जी के फोन का इंतजार था। विजेंद्र जी का फोन आ ही गया। गोस्वामी की बेटी नहीं रही। गरीबी उसे निगल गई। इस समय में घर पर बैठकर टीवी देख रहा था। इसमें समाचार चल रहा था कि मुकेश अंबानी जल्द दुनिया के सबसे अमीर आदमी होंगे।

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