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रविवार, 9 जनवरी 2011

उत्तराखंड की महिलाएं

आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उत्तराखंड की महिलाएं चेतना के मामले में पूरे देश में अव्वल हैं। 1974 का चिपको आंदोलन, 1984 में नशा नहीं रोजगार दो, 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन या फिर 2008 में शुरू हुआ नदी बचाओ आंदोलन सब में महिलओं की खासी भूमिका रही हैं। गढ़वाल में कुछ गैर शिक्षित महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर जो आंदोलन शुरू किया वह तो पूरे विश्व में हरियाली बचाने के लिए एक प्रेरणा स्रोत बना। इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाली गौरा देवी महज कक्षा चार तक पढ़ी थीं। लेकिन यह गौरा की चेतना ही थी की उनके द्वारा शुरू किया आंदोलन आज अफ्रिकी देशों तक फैल चुका है।
राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में उत्तराखंड की महिलाओं के कार्यों को भले ही महत्व नहीं मिला हेा, किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि स्वाधीनता के पूर्व और पश्चात भी उत्तराखंडी महिलाओं ने अपने सीमित दायरे और सामाजिक रूढ़ीवादिता के बावजूद अपने समय की चुनौतियों का सफलता से मुकाबला किया तथा हर समस्या के समाधान के लिए लड़ाई स्वयं लड़कर विजय प्राप्त की। उत्तराखंड में शिक्षा के क्षेत्र में प्रथम प्रर्वतकों में महिलाएं रहीं। शिक्षा और समाज सेवा में नारियों का विशेष योगदान रहा जो आज भी है।
उत्तराखंड में महिलाएं श्रम की प्रतिमूर्ति हैं। महिलाओं के श्रमदान की मिशाल गढ़वाल के चौंदकोट में बनी 31 मील लंब सड़क है जिसे बिना सरकारी मदद के महिलाओं ने बनाया। आजादी के बाद देश में महिलाओं के द्वारा किए श्रमदान का शायद यह सबसे अच्छा उदाहरण होगा। उत्तराखंड की महिलाओं की यह चेतना केवल आधुनिक युग की नहीं। आजादी से पहले चले आंदोलनों में पहाड़ की महिलाओं के योगदान को कम कर नहीं आंका जा सकता। प्रथम विश्वयुद्ध, जलियांवाला बाग कांड, नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, 1924 के दंगे, चटगांव कांड, भारत छोड़ो से लेकर आज तक पहाड़ की नारी आंदोलित हैं।
1930 में शराब के खिलाफ उत्तराखंड की महिलाओं ने जो आंदोलन छेड़ा वह तो आज तक जारी है। 1960 में जब शराब का प्रचलन तेजी से बढ़ा तो इस प्रकोप को रोकने के लिए भी उत्तराखंडी महिलाओं ने ही कमान संभाली। गढ़वाल के पौड़ी, श्रीनगर, कोटद्वार, लैंसडान तथा टिहरी गढ़वाल में टिंचरी और कुमाउं में कच्ची के नाम से शराब का जहर फैल रहा था। शराब के खिलाफ लड़ने वाली महिलाओं में प्रमुख नाम टिंचरी माई का है। टिंचरी एक ग्रामीण और कमजोर तबके की महिला थीं लेकिन चेतना इतनी की कई स्थानों पर प्रशासन इनके दबाव में आकर शराब की दुकानें बंद करानी पड़ीं। शिक्षा के क्षेत्र में गंगोत्री गर्ब्याल, मंगलादेवी, राष्ट्रीय आंदोलन में बिश्नी देवी साह, उद्यमशीलता के क्षेत्र में तुलसी देवी जैसे कई नाम हैं जो हमेशा उत्तराखंड का गौरव बढ़ाएंगे।
आज भी उत्तराखंडी समाज का पूरा तानाबाना, अर्थतंत्र महिलाओं के चारों तरफ ही घूमता है। तमाम चेतना के बावजूद पारिवार में होने वाले शोषण और अंधविश्वास की कई जकड़नों से पहाड़ की महिलाओं को बाहर निकलना है। इस छोटे से राज्य की अर्थव्यस्था की रीढ़ होने के बावजूद महिलाओं को अभी आर्थिक रूप से सबल होना है। समय-समय पर पहाड़ी समाज की पहचान के लिए उठ खड़ी होने वाली नारी को अब तक समाज की ओर से कुछ नहीं मिला। 21वीं सदी में भी प्रसव पीड़ा से सबसे अधिक मौतें उत्तराखंड में ही हो रही हैं। महिला आयोग की एक रिपोर्ट बताती है कि आज भी केवल 20 प्रतिशत महिलाओं का प्रसव ही अस्पतालों में और सुरक्षित तरीकों से होता है। जंगल में घास काटने के दौरान होने वाली महिलाओं की मौत के मामले भी कम नहीं हो सके। बाघ, भालू के हमले में घायल महिलाएं आज भी उबड़-खाबड़ रास्तों से अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दे रही हैं। इसके अलावा प्राकृति आपदाओं का शिकार भी पहाड़ में सबसे अधिक महिलाएं ही हो रही है।
खेतीबाड़ी, पशुपालन और जंगलों की पूरी जिम्मेदारी आज भी महिलाओं के ही कंधों पर है। पलायन का दंश झेलती महिलाएं ही हैं जिन्होंने भारत-चीन सीमा , भारत-नेपाल सीमा पर खाली हो रहे गांवों को आबाद कर रखा है। इसके बावजूद महिलाओं आर्थिक सशक्तीकरण आज भी बढी चुनौती है

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