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सोमवार, 20 सितंबर 2010

पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माँ नन्दा देवी
उत्तराखण्ड में नन्दा देवी पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल है जहाँ नन्दा ना केवल सुपूजित देवी है बल्कि आनन्द देने वाली कत्यूरों की कुलदेवी भी है। यह उत्सव भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को नैनीताल, चम्पावत, अल्मोड़ा, रानीखेत, द्वाराहाट, भवाली, चमोली एवं गोपेश्वर में आयोजित होता है तथा कोट की माई में भी यह होता है। इसी तरह नन्दा से जुड़ी नन्दा जात उत्तराखण्ड में प्रत्येक 12 वर्षों में नौटी तथा गोपेश्वर के मध्य आयोजित होती है।
राजा बाज बहादुर चन्द्र (सन् 1638-1678) ने एक बार गढ़वाल के बधानगढ़ व लोहनागढ़ पर चढ़ाई की तथा जूनागढ़ का किला जीता। यहाँ से वे नन्दा को मय टहलुओं के अल्मोड़ा ले आये तथा मल्ला महल में स्थापित किया। बाजबहादुर चंद के पुत्र उद्योतचन्द्र द्वारा 1680 में अल्मोड़े का वर्तमान मंदिर बनाया गया तथा 1699 में राजा ज्ञानचन्द्र के द्वारा मूर्ति स्थापित की गयी जिसे वर्तमान स्थल पर कमिशन ट्रेल (1815-1841) ने उद्योतचंदेश्वर मंदिर परिसर में रखा।
रणचण्डी नन्दा का मूल निवास हिम शिखर नन्दा देवी ही है। इसी से नन्दाकिनी नदी निकलती है तथा नन्दाकोट पर्वत इसका दरबार है। जब से मनुष्य इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ तभी से वह पेड़ पौधों पर निर्भर रहा है। लोक जीवन, रीति-रिवाज, पेड़-पोधों एवं मनुष्यों का आपसी संबंध ही लोक वनस्पति विज्ञान है। लोक साहित्य में उस क्षेत्र की महत्वपूर्ण जानकारियाँ होती है जैसे कुमाऊँनी के पर्वों में त्यौहारों, जात्राओं, व्रतों, सांस्कृतिक समारोह, संस्कारों, धार्मिक अनुष्ठानों में भी प्रकृति, वनस्पति व पेड़-पौधों के रूप में उस स्थान की संस्कृति, जलवायु तथा परम्परायें दर्शाती रहती हैं। न्यौली, चाँचरी में प्रकृति का वर्णन है तो सोलह संस्कारों में विशेष वनस्पतियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं। किसी क्षेत्र विशेष में निवास करने वाला मानव समूह अपने क्रिया कलापों को वहाँ के पर्यावरण के अनुसार ही न सिर्फ निर्धारित करता है बल्कि विकसित भी करता है। ये क्रिया कला ही एक विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप की संरचना करते हैं। संस्कृति में ही जीव जन्तुओं तथा वनस्पतियों की पूजा का विधान है।
पर्यावरणीय क्रम में माँ नन्दा देवी महोत्सव का प्रारम्भ मूर्ति निर्माण से होता है जिसके लिए दो कदली वृक्ष गाँवों से लाये जाते हैं कदली ;डनें चंतंकपेपंबंद्ध आधार क्रम है जिसमें बाँस ;ठंउइनें ेचण्द्ध की खपच्चियाँ प्रयुक्त की जाती हैं तथा रूई ;ळवेेलचपनउ ंतइवतमनउद्ध की पैंडिंग की जाती है तथा पीले वस्त्रों ;ळवेेलचपनउ इंतइमकमदेमद्ध कपास को सिया जाता है और रंगों से भव्यता तथा आभूषण से श्रृंगार किया जाता है तथा इन दोनों मूर्तियों को पाती ;।तजमउपेपं अनसहंतपेद्ध के कुशन में रखा जाता है तथा डहेलिया ;क्ंीसपंद्ध के पुष्प माला से डोला सजाया जाता है और मंत्रोच्चार से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है और डोला भ्रमण के साथ विदाई की जाती है।
प्रकृति की वनस्पतियों में कदली पवित्र है तथा भगवान विष्णु का प्रतीक एवं लक्ष्मी का वास तथा इसका फल नैवेध है। बाँस को शुद्ध माना गया है तथा इसके कई प्रयोग हैं। रूई जो शुद्ध है तथा कपड़ा इसी से बनता है जबकि पाती अर्थात् पवित्र पत्तियों वाला औषधीय पौधा है तथा पूजा पात्रों में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रकार हम प्रकृति के विभिन्न रूपों की वनस्पतियों को प्राण रूप देकर पूजते हैं तथा इन्हें जल में विदा करते हैं क्योंकि ये गलनशील है। इसमें भी महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि श्री राम सेवक सभा नैनीताल द्वारा जब पंचमी के रोज कदली के वृक्ष लाये जाते हैं उसी गाँव में 21 फलदार पौधे जलवायु अनुकूल लगाये जाते हैं जो जनचेतना का परिचायक है कि पर्यावरण संरक्षित रखना है।
चाहे गढ़वाल की मैती परम्परा हो चाहे चिपको या नवम्पत्ति द्वारा पौधारोपण या बच्चे के नामकरण पर पौध रोपण ये प्रकृति के पर्यावरण पर मानवीय दृष्टिकोण दर्शाते हैं। श्री नन्दा देवी महोत्सव में लाल वस्त्रों का अधिक प्रयोग होता है जो प्रेम, उत्साह, प्रसन्नता, वीरता एवं आभा का प्रतीक है जो बरसात के मौसम के पश्चात मानव को उत्साहित करते हैं जबकि सफेद रंग के झण्डे का अर्थ है पवित्रता, स्पष्टता, स्वच्छता, शान्ति तथा एकता। नैनीताल में यह 1903 से स्व0 मोती राम साह द्वारा आरम्भ किया गया तथा 1926 से श्री राम सेवक सभा इसे कराती है। 1992 से वृक्षारोपण का कार्य प्रारम्भ किया गया।
उत्तराखण्ड की संस्कृति संरक्षण व संवर्धन नीति का मिश्रण है जिसमें उसने पर्यावरण के साथ मधुर संबंध रखकर अपने आपको पर्यावरण का एक घटक माना है ना कि पर्यावरण को अपने उपभोग का घटक। इसीलिए पर्यावरण का उपयोग स्नेह व सम्मान से किया जाता है किन्तु वर्तमान में विकास समाज की आवश्यकता है ऐसे में परिवर्तन निश्चित है तथा संस्कृति का स्वाभाविक रूप से उसके परम्परागत क्रिया कलापों व परिवर्धन होना निश्चित है किन्तु पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए।

डॉ0 ललित तिवारी
उपाचार्य, वनस्पति विज्ञान
कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल

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