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शनिवार, 25 सितंबर 2010

क्वीरीजिमियां उजड़ गया पर हम क्या कर सकते हैं

मुनस्यारी का क्वीरीजिमियां गांव अब कभी आबाद नहीं होगा। इस बार दीपावली में दिया जलाने शायद वहां कोई नहीं जाए। कुदरत के कहर ने क्वीरीजिमियां को कहीं का नहीं छोड़ा। 36 परिवारों के छोटे से घर जैसे इस गांव के आंगन में अब जानवर कभी मैं-भैं नहीं करेंगे। एडवेंचर के लिए जाने वाले पर्यटकों को अब खेतों में डोका लिए जाने वाली महिलाएं, ग्वाले जाते किशोर, नीली कमीज, खाखी पैंट में स्कूल जाते बच्चे इस गांव में नहीं दिखेंगे। कल तक खतरों के बीच हंसता-खेलता यह गांव इतनी जल्दी खाली होगा सोचा नहीं था।
क्वीरीजिमियां के लोग अभी आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से लगाए गए टैंटों में रह रहे हैं। प्रशासन की यह कृपा कब तक रहेगी कहा नहीं जा सकता। क्योंकि यह तो परंपरा है कि जिस पर आई है भाई वही झेलेगा। टैंट उठने के बाद क्वीरीजिमियां वाले कहां जाएंगे। इसका खुद क्वीरीजिमियां वालों को पता नहीं। मुख्यमंत्री ने चालाकी से गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी हैं। मतलब सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। सीएम ने स्पष्ट बता दिया है कि हमारे पास कोई जमीन नहीं हैं। वन भूमि के लिए केंद्र से बात की जाएगी। उत्तराखंड के अलग से पुनर्वास नीति बनेगी। अब देश में नीति बनने में कितना समय लगता है भाई यह तो देश का प्रत्येक बेवकूफ आदमी जानता है। खैर जो भी दुखी न हों पहाड़ों में तो यह चलता रहता है। टिहरी उजड़ गया क्वीरीजिमियां की क्या औकात है। और हम कर भी क्या सकते हैं। हमारा भी तो परिवार है भाई नौकरी करनी है। क्वीरीजिमियां तो और भी बहुत हैं यहां।

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