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शनिवार, 12 जून 2010

खून से सनी सड़कें

राजीव पांडेय

देश में प्रत्येक दो दिन में मरने वाले तीन लोगों को तो नक्सलियों के खाते में डाल दिया गया है। जबकि उत्तराखंड में सड़क हादसों में ही रोज पांच लोगों की मौत हो रही है। इन्हें किसके खाते में डाला जाएगा। उत्तराखंड में तो सामूहिक मौतों का खेल वर्षों से जारी है। इन मौत या हत्याओं की जिमेदारी कौन लेगा। यह आज तक तय नहीं हो पाया है। हादसों का सफर कई सुहागिनों को हाथों की मेहंदी सूखने से पहले विधवा बना चुका है। कई पिता आज भी अपने कांधे पर बेटे की लाश का दर्द महसूस करते हैं। ऐसी माताओं की संया भी कम नहीं जो अपने लाल के जाने के बाद बेसुध पड़ी हैं। मासूमों की गिनती भी कम नहीं, जिनके माता-पिता छोटे से सफर में निकले थे पर आज तक नहीं लौटे।
उत्तराखंड में शायद ही कोई ऐसी सड़क हो जो खून से न सनी हो। पहाड़ की कई खाइयां हैं जहां से आज भी दर्दनाक चीख पुकार उठती हैं। अलकनंदा और रामगंगा जैसी कई जीवनदायनी नदियां इन मौतों की गवाह हैं। इन नदियों में ही न जाने आज तक कितने यात्री वाहन समा गए हैं। सड़क किनारे बसे गांव वाले आज भी जब किसी दुर्घटना का वृतांत सुनाते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते है। यह वह सवाल हैं जो न कभी विधानसभा में मुददा बने न जनता ने इनको लेकर बवाल काटा।
अब आंकड़ों में मौत का सफर तय करते हैं। अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं, २७ मई से अब तक रोज कम से कम पांच आदमी यहां सड़क दुर्घटनाओं में मारे जा रहे हैं। अकेले ३१ मई को ही १२ लोगों को पहाड़ की सड़कें लील गईं। दूर जाएंगे तो मंजर और भी भयावह दिखाई देगा। मई २००५ में अल्मोड़ा के पास हुई एक सड़क दुर्घटना को लोग अभी भूले नहीं हैं। इसमें २९ लोग मारे गए थे। इसमें बड़ी संया में यह युवा थे जो आईटीआई का प्रशिक्षण लेकर लौट रहे थे और आज तक घर नहीं पहुंचे। १७ जुलाई २००८ का दिन चंपावत वालों पर भारी पड़ा। पिथौरागढ़ से दिल्ली जा रही एक बस पर चंपावत के पास पहाड़ ही आ गिरा। इस दुर्घटना में १९ लोग दर्दनाक मौत मरे। १३ अक्तूबर २००८ को देवप्रयाग में लोगो ने मौत का तांडव देखा। एक बस दुर्घटना में २० लोग मौके पर ही मारे गए।
ऐसा नहीं कि इन सड़कों ने केवल अपनों को ही लीला हो। देवभूमि में चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु भी इसका शिकार हुए हैं। ११ अक्तूबर २००७ का दिन विष्णुप्रयाग के लोगों को भुलाए नहीं भूलता। इस दिन उड़ीसा के ४३ तीर्थायात्रियों से भरी एक बस बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा पर जा रही थी। लेकिन विष्णुप्रयाग पहुंचने से पहले ही बस अलकनंदा में समा गई। इसमें ४१ लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी। हालांकि भोलेनाथ ने अब तक कैलास मानसरोवर यात्रियों की रक्षा की है। लेकिन धारचूला से आगे मांगती तक का जो सफर है उसमें भोलेनाथ कब तक यात्रियों के साथ रहेंगे कहा नहीं जा सकता। ऐसा ही एक हादसा रीठा साहिब को जा रहे श्रद्धालुओं के साथ हुआ, जब एक ट्रक के खाई में गिर जाने से भी ११ लोगों मारे गए। यह सब तो उदाहरण हैं। विस्तार में तो लाशों का बड़ा ढेर है।
मौत का सफर तय करती इन सड़कों पर चलने वाले लोगों के बारे में कभी किसी ने सोचा हो याद नहीं आता। १९७६ में जरूर इसके लिए एक कमीशन बैठाया गया था। कमीशन ने उत्तराखंड की सड़कों में तकनीकी रूप से सैकड़ों कमियां निकालीं। कमियां आज भी यथावत हैं। लेकिन सड़क हादसों में मरने वाले लोगों की ही तरह इस जांच रिपोर्ट की भी मौत हो गई। इसी वर्ष यूपी केतत्कालीन मुयमंत्री एनडी तिवारी ने मीसा एक्ट लागू कर दुर्घटनाओं को रोकने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई। इसका असर भी दिखा और तीन साल तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई। लेकिन बिना संसाधनों केलागू किए गए कानून कितने कारगर होते हैं यह हमने दंतेवाड़ा के जंगलों में देख लिया है। इसलिए बेहतर होगा कि सड़कों पर दशकों से जारी इस मौत के सफर पर ब्रेक लगाने के लिए कोई कारगर पहल की जाए।

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