
कुदरत के कहर से कांप रहा हिमालय
कुदरत के कहर से हिमालयी राज्य कराह रहे हैं। देश पर हमेशा उपकार करने वाला हिमालय आज जार जार रो रहा है। अगस्त की शुरूआत में लेह में बादल फटने की घटना के साथ शुरू हुआ प्रकृति का प्रकोप उत्तराखंड के सुमगढ़ में 18 बच्चों को निगलने के बावजूद शांत नहीं हुआ। समाचार पत्रों के पहले पेज लाशों से पटे पड़े हैं। भीतर के पेजों में मलबे में दबे शवों को खोजने के लिए तलाशी अभियान जारी है। अस्पतालों में बेसुध पड़ी मां है। पिता की गोद में खून से लतपथ बच्चे हैं। प्रकृति के इस प्रकोप के आगे हिमालय बेवस खड़ा है।
गौरतलब है कि बादल फटने की दुर्घटना ने बीते पांच अगस्त को लेह में 200 से अधिक लोगों को लील लिया था। हजारों लोग बेघर हो गए, सैकड़ों का अब तक कोई पता नहीं लगा। माल, मवेशियों को भी अपने साथ बहाने वाली यह बाढ़ वहीं नहीं रूकी। इससे आगे बढ़कर इसने उत्तराखंड में भी भारी तबाही मचाई। लगातार गिर रहे पानी और मलबे से उत्तराखंड देश से अलगथलग पड़ गया है। अल्मोड़ा के देवली और बाड़ी गांव में बादल फटने से कई लोग लापता हैं। 35 से अधिक शव निकाले जा चुके हैं। तलाशी अभियान जारी है। डरे-सहमे लोग सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। अल्मोड़ा में ही अब तक 600 से अधिक परिवार सुरक्षित स्थानों पर पहुंच चुके हैं। गांव और आसपास के क्षेत्रों में धर्मशालाएं, स्कूल और पंचायतघर सब शराणार्थियों से भरे पड़े हैं। इस त्राशदी के बाद सरकारी तंत्र भी हमेशा की तरह चुपचाप मुआवजे की घोषणा में जुट गया है। केंद्र सरकार ने भी सुमगढ़ में राहत और मुआवजे की राशि बांट दी है। उम्मीद है जल्द अल्मोड़ा में मारे गए लोगों के लिए भी घोषणा कर दी जाएगी। हिमाचल में सतलुज नदी ने आफत मचा रखी है। 2005 में भी इस नदी ने व्यापक तबाही मचाई थी। तब तिब्बत से निकलने वाली पारछू नदी पर बनी अप्राकृतिक झील के टूटने से हिमाचल को 800 करोड़ रूपये की संपत्ति का नुकसान हुआ था। अंबाला में टांगरी तो हरियाणा में यमुना ने लोगों को दहशत में डाल रखा है। उधर, जम्मू-कशमीर अपनी आग में जल रहा है।
यह त्राशदी हिमालयी राज्यों के लिए नई नहीं है। बस यह जख्म नया है। हिमालय में बसने वाले लोग तो हमेशा ही सताए गए हैं। कभी प्रकृति ने उन्हें मारा तो कभी शासकों के शोषण का शिकार हुए। इसके विपरीत हिमालय से भारत को मिलने वाले उपकारों का कोई सानी नहीं है। प्राचनीकाल में जब मानववंश संगठित हुआ तो हिमालय ने उसे खेती करने के लिए पानी दिया, नहरें दी, और धर्म के रूप में बहुत बड़ी मूल्य प्रणाली दी। इस पर आज भी हम गर्व करते हैं। भगीरथ का गंगा को धरती पर लाना धार्मिक और आर्थिक दोनों उद्ेश्यों के लिए था। इस घटना ने मुख्यधारा के आर्यों को संपन्न और सुसंस्कृत भी बनाया। इसके बदले हिमालय को मिली केवल बेबसी। मध्ययुग के मुगल काल में भी गंगा-यमुना ने मुगलों को संपन्नता दी लेकिन मुगलों ने हिमालय को केवल लूटा ही। अंग्रेजों ने हिमालय वासियों के वनों पर नजर दौड़ाई और उनकी सारी संपन्नता का अपने लिए उपयोग किया। इसके बाद आजादी आई तो हिमालय के वाशिंदों में भी सम्मान से जीने की एक आश जागी। देश में हरित क्रांति, श्वते क्रांति और नीली क्रांति सब में ही हिमालय ने ही जान फूंकी। यहां भी हिमालय वासी ठगे गए। हिमालय के संसाधनों का उपयोग कर इससे पोषित कई राज्य आगे बढ़ते रहे लेकिन हिमालय केवल उपकार ही करता रहा।
इसके बाद सबसे बड़ा धोखा हुआ बांधों के रूप में। सदानीर नदियों को सुरंगों में डालकर पर्यावरण के साथ जबरदस्त खिलवाड़ किया गया। उत्तराखंड के ऐतिहासिक नगर टिहरी को बांध निगल गया। आज यही टिहरी बांध खौफ का सबसे बड़ा कारण बन गया है। लगातार बढ़ रहे जलस्तर से अब राज्य सरकार भी दहशत में है। वह अपने वरिष्ठ नेताओं से मदद की गुहार लगा रही है। सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री को तो भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गृहमंत्री को टिहरी बांध में बढ़ रहे जलस्तर के खतरे को लेकर चेताया है। उत्तरप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इस बांध से छोड़े गए पानी ने तबाही शुरू कर दी है। हिमालय में करोड़ों रूपये का बिजली भंडार होने के दावा करने वाली केंद्र और राज्य की सरकारें अब घबराने लगी है। खौफ लोगों के मरने का नहीं है। डर है नुकसान का। आगे की योजनाओं का। डर है उस झूठ की पोल खुल जाने का जिसमें हिमालय को संपन्नता के झूठे सपने दिखाए गए थे। इतने झूठों के बावजूद हिमालय खड़ा है उपकार करने के लिए। हालांकि इसकी श्रृखलाओं के कुछ पहाड़ साल दर साल दरक रहे हैं। अब यदि हिमालय के साथ लूटपाट बंद नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं जब हमेशा उपकार करने वाले हिमालय का रौद्र रूप हमारे सामने होगा। इसका खामियाजा हिमालय के वासियों के साथ ही अब तक इसे लूट रहे लोगों को भी भोगना होगा।
यह लेख 25 सितंबर के कांपेक्ट के संपादकीय में छपा है।

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