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मंगलवार, 28 सितंबर 2010



मैंने मंदिर में कुरान को देखा है,
मस्जिद में राम को देखा है,
पाक में बसते हिन्दुस्तान को देखा है,
हिन्दू के दिल में मुसलमान को देखा है।
फिर भी डरता हूं राम का भक्त हूं ,
रहमान की मैं फिक्र करता हूं ,
रहमान भी डरता होगा, सलामती के लिए मेरी
अल्लाह से इबादत करता होगा।
दुश्मन को न पहचानने की सजा 92 में पा चुके हैं,
इस बार सारे फैसले हो जाने दो,
हर दीवार को ढह जाने दो
तय कर लो अब मिलकर दुश्मन को हराएंगे,
जीतकर हम मंदिर से अजान देंगे
और मस्जिद में जाकर शंख बजाएंगे।

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