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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

गंगा और खाली गागर

राजीव पांडेय
जिस गंगा की गोद से अभी-अभी करोडों लोग अपने पाप धोकर निकले हैं वहां आज भी प्यास पसरी है; गंगा की जन्मस्थली गंगोत्री गलेश्यिर के ठीक नीचे कई गांव में लोग पानी खरीद कर पी रहे हैं; उखीमठ जैसे कई क्षेत्र हैं जहां लोगों को जलाभिषेक तक के लिए पानी नहीं मिल रहा है; पानी के लिए दर-दर भटक रहे लोग आए दिन जलसंस्थान और जलनिगम से गुहार लगा रहे हैं; उत्तराखंड के पुरूष पानी के लिए धरने-प्रदर्शन और गांधीगिरी तक कर रहे हैं; महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे दिन भर पानी ढो रहे हैं; यही हालात कुमाउं के डीडीहाट, गंगोलीहाट, चंपावत और पिथौरागढ के है; यह स्थिति तब है जब दिल्ली में बैठे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री मिनरल वाटर पीने के बाद देश की 86 प्रतिशत आबादी को शुद्ध पानी उपलब्ध करा देने का दावा कर रहे हैं;
राज्य में लगातार गहरा रहे जल संकट का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 30 जून तक जलसंस्थान और जलनिगम के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की छुट्टियां निरस्त कर दी गई हैं; हालांकि अब तक सरकार गरमियों में होने वाले पेजजल संकट की राह तक रही थी; इसी का परिणाम है कि अभी तक इस समस्या से निपटने के लिए हुए इंतजाम सिफर हें; कुमाउं और गढवाल की अधिकांश पेयजल योजनाएं प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर हैं; प्राकृतिक जलस्रोत वनों के अंधाधुंध दोहन के कारण जवाब दे चुके हैं; सबसे अधिक नुकसान चौडी पत्ति वाले पेड काटने के कारण हुआ; जिससे जमीन के भीतर पानी संग्रहित नहीं हो पा रहा है; जिसका परिणाम गरमियों में यह समस्या और विकराल होकर उभर रही है;
आंकड बताते हैं कि 13 जिलों वाले इस राज्य में पौडी, टिहरी, चमोली, बागेश्वर, पिथौराढ, अल्मोडा, रूद्रप्रयाग और चंपावत में करीब 5 लाख की आबादी को पानी के लिए गरमियों में ही नहीं सर्दियों में भी कडी मशक्कत करनी पडती है; आबादी का एक बडा हिस्सा तीन से सात किमी दूर से पानी ढोने के लिए मजबूर है; पहाड में स्थिति और भी भयावह है; पिथौरागढ में गंगोलीहाट तहसील की बेलपट्टी से लेकर चकराता के उदावा गांव तक लोग गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं; इन गांवों में डायरिया कई बार लोगों को मौत की नींद सुला चुका है लेकिन प्रशासन की नींद अभी तक नहीं टूटी;
अपनों पर सितम तो शासन-प्रशासन की आदत है; अब बारी है देवभूमि में तिर्थ को आने वालों की; चारधाम और कैलास मानसरोवर जैसी महत्वपूर्ण तिर्थयात्राएं हमारे सामने हैं; लेकिन तैयारी के नाम पर आश्वासन और दावो के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा है; यात्रामार्ग पर लगी पानी की टंकियां सूखी पडी है; इनमें पानी आए भी तो कहां से; गढवाल मंडल में लगे करीब 4000 हैंडपंपों में से अधिकांश ने हाथ खडे कर दिए हैं; कुछ हैंडपंप पानी के साथ बीमारी भी उडेल रहे हैं;

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

चारधाम : अलौकिकता बनी दोहन का कारण

खतरनाक डगर पर है भक्ति भारी
विकास और अत्याधुनिक सुविधाओं की चाह ने हमारे धार्मिक स्थलोंं और पर्यटन क्षेत्रों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बदरीनाथ, कैलाश मानसरोवर और अमरनाथ जैसी पावन यात्राएं भी इससे अलग नहीं हैं। इस समय जिस वैश्विक तपन से सारी दुनिया खतरे में है उससे चारधाम भी अछूता नहीं हैं। सुविधाओंं केनाम पर इस क्षेत्र मेंं अवैज्ञानिक तरीकों से हो रहे निमार्ण कार्यों ने चारधाम के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
बदरीनाथ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित १५०० वर्ष पुराना मठ है। १०३०० फीट की ऊंचाई पर स्थित इस धाम से पूरा पर्वतीय समाज भावनात्मक रूप से जुड़ा है। इसके अलावा इस क्षेत्र में पिछली ४५ पीढिय़ोंं से कई परिवारोंं की रोजी-रोटी भी बदरीनाथ के आशीर्वाद से ही चलती है। सातवीं सदी में जब आदि शंकराचार्य ने मठ का निर्माण किया और निर्वाण प्राप्त किया तब से दक्षिण भारत से लेकर गंगा-यमुना तक का हिंदु सनातनी बदरीनाथ में मोक्ष कमाने की मनसा से आता रहा है। इस धार्मिक स्थल के कारण पूरे भारतीय समाज में ही नहीं विदेशों में भी उत्तराखंड की अपनी विशेष प्रतिष्ठïा सदियों से बनी हुई है। इन्हीं स्थलों के कारण हिमालय की गोद मेंं बसी इस भूमि को देवभूमि का दर्जा भी मिला है।
साल में छह महीने तक चलने वाली चारधाम यात्रा २७ अप्रैल से शुरू हो चुकी है और इस बार भक्तजन १७ अक्तूबर तक बदरीनाथ के दर्शन कर सकेंगे। करीब दस लाख श्रद्धालु प्रतिवर्ष इस यात्रा के लिए देवभूमि पधारते हैं। तीर्थ के रास्तों में पडऩे वाले हिमशिखरों, पर्वतों, घाटियों और नदियोंं का भी विशेष महत्व है। अलकनंदा, भागीरथी, पिंडर, नंदाकिनी, मंदाकिनी आदि नदियों के मिलाप स्थल इस यात्रा मार्ग पर पांच प्रयागों का निर्माण कर यात्रा को और पवित्र कर श्रद्धालुओं को असीम शांति देते हैं। पांच प्रयागों में देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और विष्णुप्रयाग इस यात्रा के महत्वपूर्ण बनाते हैं। यात्रा केदौरान आदि बदरी के आसपास स्थित ध्यान बदरी, योग बदरी, भविष्य बदरी और विशाल बदरी की भी अपनी प्रसिद्धि है। गढ़वाल क्षेत्र में यह पंच बदरीनाथ के नाम से विख्यात हैं और यहां पुरुष सूक्त का पाठ किया जाता है। माना जाता है कि पुरुष सूक्त के निर्माता ऋषि नारायण इस आश्रम मेंं रहे थे। यह सारा वातावरण सदियोंं से ऋषियोंं, मनीषियोंं, अध्येताओं, तीर्थयात्रियोंं को न सिर्फ आकर्षित कर रहा है बल्कि उनके अनुभवों को दिव्यता और भव्यता भी प्रदान कर रहा है। पर पिछले कुछ वर्षों मेंं इसकी यही अलौकिकता इसके दोहन का प्रमुख कारण बन गई है।
आज क्षेत्र मेंं विकास केनाम पर भारी-भरकम मशीनीकरण और अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप बढ़ा है। जमीन के कारोबारियों और निजी निवेशकोंं ने पैसा कमाने की चाहत में इन पर्वतों, नदी-घाटियोंं को खोखला करने में कोई कसर नहींं छोड़ी है। इसी का परिणाम है कि वरुणावत जैसे पर्वत रूक-रूक कर ही सही अपना रौद्र रूप दिखाकर भयावह परिणामों का संकेत दे रहे हैं। प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ का ही नतीजा है कि गढ़वाल हिमालय का गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष २५ मीटर की रफ्तार से घट रहा है। बदरीनाथ क्षेत्र पहले ही दैविय आपदा और भूकंप की दृष्टिï से देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल किया जा चुका है। सीमा सड़क संगठन, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, रुड़की इंजीनियरिंग और भारतीय अनुसंधान संगठन के साथ ही अन्य संस्थान समय-समय पर इस क्षेत्र का भूगर्भीय अध्ययन करते रहते हैं। इसरो के रिमोट सेंसिग और भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग द्वारा पिछले वर्ष तैयार भूस्खलन हैजर्ड मैपिंग मेंं यात्रा मार्ग पर ४४१.५७ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित है। इसकेअलावा हाल ही मेंं आईआईटी रुड़की द्वारा किए अध्ययन से भी खतरनाक संकेत मिलते हैं। आईआईटी ने ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग तक १३३ किलोमीटर मार्ग का सर्वेक्षण किया इसमें ४० किमी हिस्सा दुर्घटना के लिहाज से बेहत संवेदनशील है। इस ४० किमी के क्षेत्र मेंं कम चौड़ाई वाले तीव्र मोड़ हैं जो पहाड़ोंं पर दुर्घटना का सबसे बड़ा कारण हैं। इसके अलावा सड़क केकिनारे रेलिंग्स, दिशा चिन्ह, संड़क पर सेंटर लाइन और खतरे केनिशानों तक का अभाव है। यह कमियां यात्रा को और जटिल बनातीं हैं।
यात्रा को सुगम बनाने के लिए सड़क चौड़ा करने का काम शुरू होने के बाद खतरा और बढ़ा है। विस्फोटकों के इस्तेमाल से चट्टïानें कमजोर हुईं हैं। इसकेअलावा जल विद्युत परियोजनाओंं केलिए बन रही सुरंगोंं ने पहले से ही अपरिपक्व पहाड़ों को और नाजुक कर दिया है। चारधाम यात्रा मार्ग की हालत खस्ता है। उत्तराखंड पुलिस ने इस मार्ग पर ३०० से अधिक ऐसे बिंदु चिन्हित किए हैं जो दुर्घटना की दृष्टिï से बेहद संवेदनशील हैं। यह खतरे उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी में हैं। हाईवे पर बनीं पुलियाओंं की हालत भी नाजुक है। इसमेंं कई पुलिया तो ऐसी हैं जिन्हें बिल्कुल नए सिरे से निर्माण की आवश्यकता है इसका प्रस्ताव भी केंद्र सरकार के पास लंबित पड़ा है। आवाजाही तो इनमें चल रही है लेकिन भारी वाहन का वजन सहन अब इनके बस की बात नहीं और कभी भी कोई बढ़ी दुघर्टना घट जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। इसी खस्ताहाल मार्ग पर अब तक सैकड़ों यात्री अपने प्राण गंवा चुके हैं। २००८ मेंं ही यहां १३९ लोगोंं की जान गई जबकि १२९ लोग गंभीर रूप से घायल हुए। २००३-२००४ में इस मार्ग पर ७७ दुर्घटनाएं हुईं। २००४-२००५ मेंं यह संख्या ८५ पर पहुंच गई जबकि २००६-२००७ मेंं यह आंकड़ा १०० के पार चला गया। सराकारी आंकड़ों के मुताबिक इन दुर्घटनाओंं मेंं करीब १००० आदमी मारे गए और २००० गंभीर रूप से घायल हुए। यह केवल यात्रा सीजन का आंकड़ा है। वरन तो पहाड़ पर सड़क दुर्घटना अब आम बात है।
बदरीनाथ धाम केपर्यावरणीय जानकार बताते हैं कि स्कंधपुराण मेंं इस क्षेत्र का वर्णन गंगा मधान क्षेत्र के रूप में किया गया है। हाल केसालोंं मेंं यहां दुर्लभ जड़ी-बुटियों और पेड़ पौधोंं का अस्तित्व था जो अवैज्ञानिक निर्माण की भेट चढ़ गया। यहां की पर्वतमालाएं ग्लोबल वार्मिंग से जुझ रहीं हैं कभी चांदी की तरह चमकने वाले इन पहाड़ों पर कालिख भी दिखने लगी है। पर इसकी तरफ किसी का ध्यान नहींं जाता। सारा ध्यान यात्रियोंं की अधिक आमद और अंधी कमाई पर रहता है। यात्रा पर आने वाले मेहमानों और स्थानीय आबादी की खुशहाली को तपोस्थलोंं से जोडऩे की पहल कहींं नजर नहीं आती। यदि हम अब भी न चेते और भगवान बदरीनाथ ने स्वयं अपना रूप बदल लिया तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

राजीव पाण्डेय, देहरादून
9411348180

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

उनकेचेहरे पर दिखती है वास्तविकता

दशकों से जारी है वन्यजीवों के साथ अस्तित्व की लड़ाई
उत्तराखंड बनने केबाद मारे गए ८०० से अधिक लोग

राजीव पांडेय, देहरादून

बंदूक ल्यौ जसपाल राणा, सिस्त साधी दे
उत्तराखंड में बाघ लाग्यों, बाघ मारि दे
नथ्यूली गले की टोई, सोना का मेडल द्यूलो
बच्यूं रलो जब तक, राणा तैरो नाम ले लो
गढ़वाली लोकगीत केयह बोल उत्तराखंड में वन्यजीवों के आतंक में जी रहे लोगों की पीड़ा बयां करते हैं। एक महिला अतंरराष्टï्रीय शूटर जसपाल राणा से गुहार लगाती है कि वह हिंसक हो चुके इन जानवरों पर निशाना साधे और लोगों को उनके आतंक से मुक्ति दिलाए। इसके एवज में वह राणा को अपनी सोने की नथ और गलोबंद का मैडल देने के साथ ही उनका जीवनभर गुणगान करने का भी वादा करती है। यह गीत ९० के दशक में प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र नेगी ने लिखा था लेकिन इस गीत की प्रासंगिकता अभी खत्म नहीं हुई है।
उत्तराखंड में एक बार फिर वन्यजीवों और मानव के बीच अस्तित्व का संघर्ष छिड़ा हुआ है। सैकड़ों निर्दोष जानवर और मनुष्य एक-दूसरे केहाथों मारे जा चुके हैं, सिलसिला अभी जारी है। पर्यावरण और वन अधिकारी इसे जंगलों में बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम मानते हैं। उनका कहना है कि अवैध शिकार के कारण जंगलों में खाने के लिए कुछ नहीं बचा इसलिए वन्यजीव भोजन की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। वन्यजीव खासकर गुलदारों के आतंक में जी रहे लोगों की व्यथा इससे बिल्कुल अलग है। उनका आरोप है कि सरकारी नीति के केंद्र में मानव नहीं बाघ है। यही कारण है कि एक बाघ का मरना तो राष्टï्रीय-अंतरराष्टï्रीय स्तर पर बड़ी खबर बनती है। इसके विपरीत आदमखोर के हमले में जब कोई मानव मारा जाता है तो जंगलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप का हवाला देकर इतिश्री कर दी जाती है। पीडि़त लोगों का मानना है कि मुनष्य को देखकर वन्यजीवों में जो स्वाभाविक डर था वह पार्कों और अभ्यारणों में बढ़ती पर्यटकों की आवाजाही के कारण खत्म हो गया है। इसलिए यह जानवर अब मनुष्य को देखकर भागते या दुबकते नहीं बल्कि हमला करने केलिए दौड़ते हैं। ऐसे में इनका सबसे आसान शिकार होते है महिलाएं और बच्चे।
उत्तराखंड केअस्तित्व में आने के बाद से ही अब तक वन्यजीवों के हमले में ८०० से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। ४१३ लोग ऐसे भी हैं जो हिंसक हो चुकेजानवरों के हमले के बाद रोटी खाने केलिए भी दूसरों पर निर्भर हैं। वन्यजीवों में उत्तराखंड के लिए गुलदार सबसे खतरनाक साबित हुए हैं। २१वीं सदी के आगाज केसाथ ही इन्होंने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। इसी का परिणाम हुआ कि वर्ष २००१ में ३७ लोग गुलदार केहमले में मारे गए। इतना होने पर भी शासन-प्रशासन केवल मुआवजा बांटता रहा और २०१० तक गुलदारों ने विभिन्न हमलों में करीब २५० लोगों को मौत की नींद सुला दिया। जबकि इस बीच बाघ ने नौ लोगों को मारा और करीब २० लोगों को अपाहिज बनाया। पहाड़ों में गुलदार तो मैदानी क्षेत्रों में हाथी निरिही जनता को मौत का तांडव दिखाते रहे। बीते ९ वर्षों में हाथियों ने तराई के इलाके में ७६ लोगों की जान ली है। इसके अलावा बड़ी मात्र में फसल नष्टï करना और घरों पर हमले आज भी आए दिन जारी हैं। यह सरकारी आंकड़े हैं जबकि वास्तविकता इससे भी खतरनाक है। अब यदि वास्तविकता देखनी है तो उन ग्रामीणों के चेहरे देखिए जो आदमखोर हो चुके जानवरों केसाये में जीने के लिए मजबूर हैं।
२१वीं सदी की यह कहानी नई है। इसकेजख्म अभी पूरी तरह भरे नहीं हैं। जबकि उत्तराखंड के लोगों की पीड़ा इससे बहुत पुरानी है। २०वीं सदी में जाएं तो १९७७ से लेकर २००० तक देश में १६०० लोग वन्यजीवों के हमले में मारे गए। इसमें भी उत्तराखंड के लोगों पर सबसे अधिक काल टूटा और ७५० लोग बेवक्त दुनिया से चले गए। १००० लोग घायल हुए जिनके शरीर पर मौत केनिशां आज भी बांकी हैं। करीब ४०० लोग ऐसे हैं जिन्हें उठने और बैठने के लिए भी सहारा चाहिए। इनकी सांसें चल रहीं हैं तो केवल मौत के इंतजार में।
हिंसक हो चुके इन जानवरों से निपटने केलिए सरकार के पास आज भी कोई ठोस नीति नहीं है। उत्तराखंड में आज भी नरभक्षी हो चुके इन जानवरों को मारने या पकडऩे के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। इस कारण अप्रशिक्षित कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। इससे कई बार निर्दोष वन्यजीव मारे जाते हैं और वन विभाग आदमखोर जानवरों को मारने का दावा करता है। आदमखोर जानवरों के हमले में मारे जा चुके या मारे जा रहे लोगों के परिजनों के लिए शासन-प्रशासन के पास बड़े-बड़े तर्क और मामुली सा मुआवजा है। मुआवजे के लिए लोग वर्षों तक भटकते हैं और तर्क उनकी समझ में आते नहीं। तर्क दिया जाता है कि विकास केलिए जंगल काटे जा रहे हैं। बांध बन रहे हैं, उद्योग लग रहे हैं, सड़कें बन रही हैं। यदि यह सब विकास है तो आज भी उत्तराखंड केलोग बिजली संकट से क्यों जूझ रहे हैं? उद्योगों के बावजूद पलायन क्यों बढ़ रहा है? बदहाल सड़कों से अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही गर्भवती मां क्यों दम तोड़ दे रही है? यह कुछ उलझे सवाल हैं जिनके जवाब आज भी उत्तराखंड के लोगों को नहीं मिले हैं।

शनिवार, 20 मार्च 2010

आप बताओ कौन सा लोकतंत्र सच्चा है

मेरी उम्र 30 वर्ष होने को है। मैंने कक्षा 9 से शायद अखबार में खेल के अलावा अन्य पेज देखने शुरू किए। तभी से मैं पढ़ता और सुनता आ रहा हूं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस देश में सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है। इसके बाद मैंने एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई राजनीति विज्ञान से कि तो कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य भारतीय लोकतंत्र के बारे में जाने। कई अन्य स्रोतों से भी लोकतंत्र के बारे में पढ़ा लेकिन अभी तक लोकतंत्र की महिमा को समझ नहीं पाया। अब यदि भारतीय परंपरा के लोकतंत्र को देखता हूं तो यह बड़ा ही लचिला लगता है। अभिव्यक्ति की आजादी देश में जरूर है लेकिन आदमी की औकात देखकर। लोकतंत्र में उसे ही जीने का मौका मिलता है जिसकी सत्ता में बेहतर पकड़ है या उसकी क्षमता इतनी है कि वह सरकार को हिला सके। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मनसे का राज ठाकरे है। शिवसेना का बाल ठाकरे है इनके लिए देश में पूरा लोकतंत्र है। हालांकि यह लोग खुद लोकतंत्र के हिमायती नहीं है। इसके अलावा भाजपा से जुड़े कुछ टट्पुंजिए छोटेमोटे राजनीतिक दल हैं जो किसी का भी सर कलम करने की धमकी दे सकते हैं। पर यह भारतीय लोकतंत्र की उदारता है कि इनकी सारी धमकियों को अभिव्यक्ति माना जाता है। इनकी सुरक्षा भी उन्हीं लोगों केधन से सरकार करती है जिनका सर कलम करने का फरमान यह लोग जारी करते हैं। इसकेविपरीत लोकतंत्र का दूसरा पहलू भी है। इसमें उन कर्मचारियों पर एस्मा लगा दिया जाता है जो अपनी मांगों को लेकर शांति पूर्वक धरना प्रदर्शन करते हैं। इसकी एक बानगी हाल के दिनों उत्तराखंड में दिखाई दी यह उस सरकार ने किया जिसके मुखिया एक तथाकथित साहित्यकार हैं। यह भी लोकतंत्र है। इसके अलावा हालिया दिनों में इस लोकतंत्र में एक और चीज तेजी से बढ़ी है। सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले गरीबों के हक की लड़ाई में उनका साथ देने वालों को अब नक्सली कहा जाता है। जो लोग देश से गरीबी मिटाने के लिए प्रयासरत हैं उन्हें माओवादी कह उन पर रासुका लगाकर जेल में ठूंसने की प्रक्रिया जारी है। जो इनका समर्थन करता है उसकी हालत बिनायक सेन या हिमांशु जैसी कर दी जाती है। अब आप बताईए कौन सा लोकतंत्र सच्चा है और हम किसको मजबूत करने के लिए प्रयास करें।

मंगलवार, 9 मार्च 2010

भारी पड़ेगी मां के गर्भ से छेड़छाड़

नई विकृति है ग्रहों की चाल के अनुसार प्रसव
प्रकृति पर पूरी तरह निर्भर रहकर ही मनुष्य जीवित नहीं रह सकता यह अटूट सत्य है। जीने के लिए हमें कई बार प्रकृति के विपरीत जाकर भी काम करने पड़ते हैं। लेकिन इस सत्य को भी नहीं नकारा जा सकता कि प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ निश्चित रूप से जानलेवा होगी। पर, इन सबसे बेपरवाह प्रकृति के साथ बारबार बलात्कार करना मनुष्य की फितरत बन गई है। विकास की आड़ में प्राकृतिक संतुलन बिगाडऩा मनुष्य अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगा है। इसकी गंभीरता इंसानों के बन रहे क्लोन से पता लगती है। सरोगेसी तकनीक ने मां-बेटे के बीच स्थापित माप-दंडों के मूल्य को शून्य कर दिया है। अब मां का गर्भाशय एक थैली बनकर रह गया है। पैसे के दम पर कोई भी कोख को किराये पर ले सकता है। भ्रूण हत्या की परिणति हम वर्ष 2005 में आई मनीष झा की फिल्म 'मातृभूमि ’ में देख चुके हैं। इन सबके बीच अब एक नया ट्रेंड विकसित हुआ है जो मनुष्य की विकृत हो चुकी मानसिकता की ओर संकेत करता है। यह चलन दक्षिण से चलकर उत्तर भारत के शहरों तक पहुंचा है। इसमें प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का कारण एक तरफ अंधविश्वास है तो दूसरी ओर डाक्टरों की पैसा कमाने की भूख। कई मां-बाप भू्रण के पुष्टï होने से पहले ही ऑपरेशन के जरिए उसे बाहर निकाल दे रहे हैं। कई मामलों में आधुनिक दवाइयों और इंजेक्शनों के माध्यम से प्रसव को रोक दिया जा रहा है। प्रसव का यह समय ज्योतिष से पूछकर नियत किया जाता है ताकि ग्रहों की चाल के अनुसार बच्चा पैदा हो और दुनिया पर राज करे। जबकि चिकित्सक इसे केवल इसलिए बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि ऑपरेशन के माध्यम से होने वाले प्रसव में उनकी कमाई सामान्य प्रसव की तुलना में 20 हजार रुपये से अधिक होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी चिकित्सकों की इस मनसा का खुलासा कर चुका है। डब्लूएचओ की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में डॉक्टरों द्वारा गर्भवती महिलाओं के प्रसव के लिए किए जाने वाले ’यादातर ऑपरेशन का मां और बच्चे की सेहत से कोई लेना-देना नहीं है यह केवल पैसा कमाने की तरकीब हैं। इसी का परिणाम है कि हर पांच में से एक प्रसव ऑपरेशन के जरिए किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007-08 में भारत, चीन, श्रीलंका, जापान और नेपाल समेत नौ एशियाई देशों में ऑपरेशन के जरिए प्रसव मेें 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत में यह वृद्धि 18 प्रतिशत है जबकि चीन में इस तरह के मामले से सबसे अधिक देखे गए हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराने की दर में पांच से 65 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। भारत में ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराने की सूची में अव्वल हैं गुजरात, मध्य प्रदेश और दिल्ली जबकि सरोगेसी के सबसे अधिक मामले भी गुजरात में ही होते हैं। डब्लूएचओ के अनुसार ऑपरेशन से प्रसव कराने के 15 प्रतिशत के मान्य स्तर के ऊपर के मामले आपात स्थिति में ऑपरेशन की जरूरत के लिए नहीं, बल्कि पैसे बनाने के लिए किए जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भवती महिलाओं को इस तरीके से प्रसव से बचने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि सामान्य प्रसव की तुलना में इस प्रक्रिया में मातृ मृत्यु, शिशु मृत्यु, आईसीयू की नौबत आने के अलावा रक्त चढ़ाने आदि की समस्याएं आ सकती हैं। जबकि मां के गर्भ में पल रहे भ्रूण को परिपक्व होने से पूर्व निकालना या फिर दवाइयों के दम पर उसे रोक देना और भी घातक हो सकता है। इससे मां और बच्चे दोनों की जान के लिए खतरा बना रहता है। इस तरह पैदा हुए बच्चों को अक्सर सांस लेने में खासी दिक्कत होती है और एक परिपक्व शरीर न बन पाने के कारण कई बार वह आंख खोलने से पहले ही मौत के मुंह में होते हैं। पुरुष प्रधान समाज में मां की कोख केसाथ छेड़छाड़ की यह विकृति अब पूरे भारत में फैल रही है। करीब एक दशक पूर्व दक्षिण के राज्य आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु से शुरू हुआ यह सफर अब उत्तर भारत केछोटे-छोटे शहरों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। देहरादून, कानपुर, लखनऊ जैसे शहरों में भी लोग इस तरह का दुस्साहसिक कदम उठाने से परहेज नहीं कर रहे हैं। यह वह शहर हैं जहां नियोनेटल केयर की सुविधा उपलब्ध नहीं है। नियोनेटल के जरिए कोख से बाहर भी बच्चे को विकसित किया जा सकता है। भारत केकुछ ही महानगरों में अभी यह सुविधा पूरी तरह उपलब्ध है लेकिन कोख छेड़छाड़ पूरे देश में हो रही है। जिसके लिए मां और बच्चे की जान को खतरे में डालने से भी लोग गुरेज नहीं कर रहे। ऐसा नहीं कि गर्भ में भू्रण का पता लगाने की इच्छा नई है। यह रीत वैदिक काल से चली आ रही है। लेकिन तब मां की कोख से छेड़छाड़ नहीं की जाती थी। आयुर्वेद में इच्छित संतान की प्राप्ति के उपायों को पुंसवन कर्म कहा गया है। यह कर्म मां के गर्भ में भ्रूण के लिंग निर्धारण से पूर्व विशेष काल और विधि के अनुसार किया जाता था। इसमें स्त्री के लक्षणों को देखकर जड़ी-बूटी या अन्य प्रक्रियाओं के माध्यम से लिंग निर्धारण के प्रयास किए होते थे। महर्षि सुश्रुत और वाणभट्टï ने भी इस प्रकार के लक्षणों का वर्णन करते हुए लिखा है कि जिस स्त्री के दक्षिण स्तन में पहले दुग्ध की उत्पति हो, दक्षिण आंख भरी हो, जो दाहिने पैर को उठाकर चलती हो, जिसका मुख वर्ण प्रसन्न हो वह पुत्र उत्पन्न करेगी। जबकि इसके विपरीत लक्षण वाली स्त्री कन्या को जन्म देती है। आधुनिक विज्ञान में यह शोध का विषय है। पर, यह तय है कि इस प्रक्रिया से मां और बच्चे के जीवन को कोई खतरा नहीं होता था। लेकिन आज आधुनिक चिकित्सा के गुमान, चिकित्सकों की पैसे की भूख और हमारे अंधविश्वास ने सारे नियमों को तोड़ गर्भ में हाथ डालने की कोशिश शुरू कर दी है। इसके गंभीर परिणाम विकृत मानव के रूप में हमारे सामने होंगे।

राजीव पांडेय , देहरादून

विस्थापन का दर्द कम कर सकते हैं घराट

घराटों को लेकर विश्वव्यापी चिंतन
बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से उपजी विस्थापन की पीड़ा को कम करने के लिए घराटों (पनचक्की) के संरक्षण की मुहिम तेज हो गई है। भारी जन दबाव के चलते ही सही सरकार ने इनके उन्नयन केलिए काम शुरू कर दिया है। उत्तराखंड में ही अब तक 700 से अधिक घराटों का आधुनिकीकरण किया जा चुका है। इसमें कई ऐसे घराट भी शामिल हैं जिनकी बिजली से सुदूर बसने वाले कई गांवों मेंं आज बल्ब टिमटिमा रहे हैं। यह ऐसे गांव हैं जहां हाल-फिलहाल तो हाईटेंशन लाइन के माध्यम से बिजली पहुंचाना आसा नहीं था। इसके अलावा इन घराटों ने स्थानीय लोगों में रोजगार की भी एक उम्मीद जगाई है। इसी उम्मीद को देखते हुए संयुक्त राष्टï्र संघ की बॉडी, यूनाइटेड नेशन इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन, भारत सरकार और उत्तराखंड में घराटों के संरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रही संस्था हैस्को ने फरवरी 2010 में घराटोंं के आधुनिकीकरण को तेज करने के लिए एक सेमिनार आयोजित किया है।
इस आयोजन का मुख्य उद्ेश्य घराटों का संरक्षण कर ग्लोबल वार्मिंग के असर और विस्थापन के दर्द को कम करना है। 80 के दशक मेंं औद्योगिक विकास की गति तेज होने के साथ ही घराटों का अस्तित्व खतरे मेंं पड़ गया था। दूसरी शताब्दी के आसपास घराट तब अस्तित्व मेंं आए जब मानव के सामने अनाज उगाने की कला विकसित करने के बाद इसे खाने लायक बनाने की चुनौती थी। इसी केचलते घराटों का निर्माण हुआ और यह लोक विज्ञान का पहला आविष्कार था। पत्थर के साथ लकड़ी को बांधकर पानी की धार से चलने वाले इस उपक्रम को पानी पर आधारित पहला उद्योग भी कहा जा सकता है। ब्रिटिश काल मेंं एक दौर ऐसा भी था जब घराटों से होने वाली आय से गांव मेंं शिक्षकोंं को वेतन दिया जाता था। साथ ही गांव के कई विकास कार्यें में भी इससे होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा लगता था।
पर 1980 में बड़े पैमाने पर नदी घाटी परियोजनाएं अस्तित्व में आईं। इनके सामने घराट प्रतियोगी रूप से सफल नहीं थे जिसके चलते इन्हें प्रचलन से बाहर होना पड़ा और अब तक इसके सहारे आजीविका चला रहे लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ। बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के बनने से देश के महानगर तो जरूर रोशन हुए पर जिन ग्रामीणों की कीमत पर यह परियोजनाएं बनी उन्हें केवल विस्थापन ही मिला। इसी के चलते आजादी से अब तक जल विद्युत परियोजनाओं के कारण करीब 3 करोड़ 50 लाख लोगों को विस्थापन का दर्द सहना पड़ा। इसी का परिणाम था कि तिनका-तिनका जोड़कर बना टिहरी का ऐतिहासिक शहर उत्तराखंड के नक्शे से गायब हुआ। साथ ही एक लाख लोगों को अपनी जन्मभूमि छोडऩी पड़ी। नर्मदा में बने सरदार सरोवर बांध में 245 गांव डूबे। इसमें 33 गांव महाराष्टï्र के, 193 गांव मध्यप्रदेश के और 19 गांव गुजरात के शामिल थे जिनका नामोनिशान मिट चुका है और इन गांवों में बसने वाले लाखों लोग देश में ही बिखरे हुए है। यदि अब उत्तराखंड में प्रस्तावित पंचेश्वर बांध अस्तित्व में आता है तो करीब 40,000 लोग और विस्थापित होंगे इसमें नेपाल और भारत दोनों ही देशों के बाशिंदे शामिल हैं। विस्थानपन की यह पीड़ा केवल भारत मेंं ही नहीं विश्व के अन्य देशों मेंं भी है। इसी कारण अब इसके विकल्प के रूप में छोटी जल विद्युत परियोजनाओं को देखा जा रहा है जिसमें घराट भी शामिल है। घराटोंं को लेकर यूरोप, अफ्रीका, केन्या, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका मेंं भी चिंतन का दौर जारी है।
पहाड़ी राज्यों मेंं घराटों का अस्तित्व आज भी बचा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड मेंं वर्तमान मेंं 13000 घराट हैं। जबकि एक समय इनकी संख्या 70 हजार के आसपास थी। हिमाचल और जम्मूकश्मीर में भी घराटों की संख्या अच्छी खासी है। उत्तराखंड मेंं घराटोंं को लेकर चिंतन सही मायनोंं मेंं 90 के दशक मेंं शुरू हुआ। जब घराटों के संरक्षण को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए लोगों ने पद यात्राएं निकालनी शुरू कीं। इसी दबाव से सरकार चेती और 1994 में घराटों के उन्नयन की मुहिम सरकारी स्तर पर शुरू हुई। 1999 में सरकार ने इसे उद्योग का दर्जा दे दिया।
इसके बाद आईआईटी और अन्य संस्थान इस तकनीक को विकसित करने में लग गए। पर इन संस्थानोंं का तरीका परंपरागत तरीके से अलग था। इसमें गांव के लोगों से कोई मशविरा नहींं हुआ जो दूसरी शताब्दी से ही घराट का संचालन करने के साथ ही इसके संरक्षण में लगे थे। इस कारण आईआईटी और अन्य संस्थानोंं ने जो तकनीक विकसित की वह महंगी होने के साथ ही ग्रामीणों के अनुसार काफी कठिन भी थी। इन संस्थानोंं द्वारा बनाए गए घराटों के खराब हो जाने पर ग्रामीणों के पास इसका कोई उपचार नहीं था। इस समस्या से निपटने के लिए और सरकार से अपने माफिक घराट बनवाने को लेकर 1994 में चमोली के गडोरा गांव में पहला घराट संगठन बना। हालांकि अब सरकार ने उत्तराखंड केप्रत्येक जिले में घराट समितियां बना दी हैं। इसके बाद उत्तराखंड में लघु जल विद्युत परियोजना बनाने केकाम में लगे उरेडा ने भी ग्रामीण स्तर पर बने इन संगठनोंं की बात को मानते हुए इस तकनीक को सस्ता और सरल बनाने की कोशिश की है। जम्मूकश्मीर में जयेडा तथा हिमाचल में हिम ऊर्जा यह काम कर रहे हैं। जम्मूकश्मीर में तो सेना भी इस काम में सहयोग कर रही है। नेपाल और श्रीलंका से सीख लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने भी लघु जल विद्युत परियोजनाओं के प्रति अपना रुझान प्रदर्शित करने के लिए एक मेगावाट तक की परियोजनाओं को लाइसेंस मुक्त कर दिया। जबकि नेपाल में यह प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो चुकी है। भारत की सीमा से लगे नेपाल के अनेक गांवों के लोग जरूरत के मुताबिक बिजली बना रहे हैं जिससे सुदूर पहाड़ों पर बसे गांव तो रोशन हुए ही हैं साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है। इसके बाद विस्थापन का दर्द की बहुत हद तक कम हुआ है। यह सब हुआ सैकड़ों वर्षों से मौजूद घराटों के आधुनिकीकरण से।


राजीव पांडेय