दशकों से जारी है वन्यजीवों के साथ अस्तित्व की लड़ाई
उत्तराखंड बनने केबाद मारे गए ८०० से अधिक लोग
राजीव पांडेय, देहरादून
बंदूक ल्यौ जसपाल राणा, सिस्त साधी दे
उत्तराखंड में बाघ लाग्यों, बाघ मारि दे
नथ्यूली गले की टोई, सोना का मेडल द्यूलो
बच्यूं रलो जब तक, राणा तैरो नाम ले लो
गढ़वाली लोकगीत केयह बोल उत्तराखंड में वन्यजीवों के आतंक में जी रहे लोगों की पीड़ा बयां करते हैं। एक महिला अतंरराष्टï्रीय शूटर जसपाल राणा से गुहार लगाती है कि वह हिंसक हो चुके इन जानवरों पर निशाना साधे और लोगों को उनके आतंक से मुक्ति दिलाए। इसके एवज में वह राणा को अपनी सोने की नथ और गलोबंद का मैडल देने के साथ ही उनका जीवनभर गुणगान करने का भी वादा करती है। यह गीत ९० के दशक में प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र नेगी ने लिखा था लेकिन इस गीत की प्रासंगिकता अभी खत्म नहीं हुई है।
उत्तराखंड में एक बार फिर वन्यजीवों और मानव के बीच अस्तित्व का संघर्ष छिड़ा हुआ है। सैकड़ों निर्दोष जानवर और मनुष्य एक-दूसरे केहाथों मारे जा चुके हैं, सिलसिला अभी जारी है। पर्यावरण और वन अधिकारी इसे जंगलों में बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम मानते हैं। उनका कहना है कि अवैध शिकार के कारण जंगलों में खाने के लिए कुछ नहीं बचा इसलिए वन्यजीव भोजन की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। वन्यजीव खासकर गुलदारों के आतंक में जी रहे लोगों की व्यथा इससे बिल्कुल अलग है। उनका आरोप है कि सरकारी नीति के केंद्र में मानव नहीं बाघ है। यही कारण है कि एक बाघ का मरना तो राष्टï्रीय-अंतरराष्टï्रीय स्तर पर बड़ी खबर बनती है। इसके विपरीत आदमखोर के हमले में जब कोई मानव मारा जाता है तो जंगलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप का हवाला देकर इतिश्री कर दी जाती है। पीडि़त लोगों का मानना है कि मुनष्य को देखकर वन्यजीवों में जो स्वाभाविक डर था वह पार्कों और अभ्यारणों में बढ़ती पर्यटकों की आवाजाही के कारण खत्म हो गया है। इसलिए यह जानवर अब मनुष्य को देखकर भागते या दुबकते नहीं बल्कि हमला करने केलिए दौड़ते हैं। ऐसे में इनका सबसे आसान शिकार होते है महिलाएं और बच्चे।
उत्तराखंड केअस्तित्व में आने के बाद से ही अब तक वन्यजीवों के हमले में ८०० से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। ४१३ लोग ऐसे भी हैं जो हिंसक हो चुकेजानवरों के हमले के बाद रोटी खाने केलिए भी दूसरों पर निर्भर हैं। वन्यजीवों में उत्तराखंड के लिए गुलदार सबसे खतरनाक साबित हुए हैं। २१वीं सदी के आगाज केसाथ ही इन्होंने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। इसी का परिणाम हुआ कि वर्ष २००१ में ३७ लोग गुलदार केहमले में मारे गए। इतना होने पर भी शासन-प्रशासन केवल मुआवजा बांटता रहा और २०१० तक गुलदारों ने विभिन्न हमलों में करीब २५० लोगों को मौत की नींद सुला दिया। जबकि इस बीच बाघ ने नौ लोगों को मारा और करीब २० लोगों को अपाहिज बनाया। पहाड़ों में गुलदार तो मैदानी क्षेत्रों में हाथी निरिही जनता को मौत का तांडव दिखाते रहे। बीते ९ वर्षों में हाथियों ने तराई के इलाके में ७६ लोगों की जान ली है। इसके अलावा बड़ी मात्र में फसल नष्टï करना और घरों पर हमले आज भी आए दिन जारी हैं। यह सरकारी आंकड़े हैं जबकि वास्तविकता इससे भी खतरनाक है। अब यदि वास्तविकता देखनी है तो उन ग्रामीणों के चेहरे देखिए जो आदमखोर हो चुके जानवरों केसाये में जीने के लिए मजबूर हैं।
२१वीं सदी की यह कहानी नई है। इसकेजख्म अभी पूरी तरह भरे नहीं हैं। जबकि उत्तराखंड के लोगों की पीड़ा इससे बहुत पुरानी है। २०वीं सदी में जाएं तो १९७७ से लेकर २००० तक देश में १६०० लोग वन्यजीवों के हमले में मारे गए। इसमें भी उत्तराखंड के लोगों पर सबसे अधिक काल टूटा और ७५० लोग बेवक्त दुनिया से चले गए। १००० लोग घायल हुए जिनके शरीर पर मौत केनिशां आज भी बांकी हैं। करीब ४०० लोग ऐसे हैं जिन्हें उठने और बैठने के लिए भी सहारा चाहिए। इनकी सांसें चल रहीं हैं तो केवल मौत के इंतजार में।
हिंसक हो चुके इन जानवरों से निपटने केलिए सरकार के पास आज भी कोई ठोस नीति नहीं है। उत्तराखंड में आज भी नरभक्षी हो चुके इन जानवरों को मारने या पकडऩे के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। इस कारण अप्रशिक्षित कर्मचारी तैनात किए जाते हैं। इससे कई बार निर्दोष वन्यजीव मारे जाते हैं और वन विभाग आदमखोर जानवरों को मारने का दावा करता है। आदमखोर जानवरों के हमले में मारे जा चुके या मारे जा रहे लोगों के परिजनों के लिए शासन-प्रशासन के पास बड़े-बड़े तर्क और मामुली सा मुआवजा है। मुआवजे के लिए लोग वर्षों तक भटकते हैं और तर्क उनकी समझ में आते नहीं। तर्क दिया जाता है कि विकास केलिए जंगल काटे जा रहे हैं। बांध बन रहे हैं, उद्योग लग रहे हैं, सड़कें बन रही हैं। यदि यह सब विकास है तो आज भी उत्तराखंड केलोग बिजली संकट से क्यों जूझ रहे हैं? उद्योगों के बावजूद पलायन क्यों बढ़ रहा है? बदहाल सड़कों से अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही गर्भवती मां क्यों दम तोड़ दे रही है? यह कुछ उलझे सवाल हैं जिनके जवाब आज भी उत्तराखंड के लोगों को नहीं मिले हैं।

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