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सोमवार, 12 अप्रैल 2010

चारधाम : अलौकिकता बनी दोहन का कारण

खतरनाक डगर पर है भक्ति भारी
विकास और अत्याधुनिक सुविधाओं की चाह ने हमारे धार्मिक स्थलोंं और पर्यटन क्षेत्रों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बदरीनाथ, कैलाश मानसरोवर और अमरनाथ जैसी पावन यात्राएं भी इससे अलग नहीं हैं। इस समय जिस वैश्विक तपन से सारी दुनिया खतरे में है उससे चारधाम भी अछूता नहीं हैं। सुविधाओंं केनाम पर इस क्षेत्र मेंं अवैज्ञानिक तरीकों से हो रहे निमार्ण कार्यों ने चारधाम के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
बदरीनाथ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित १५०० वर्ष पुराना मठ है। १०३०० फीट की ऊंचाई पर स्थित इस धाम से पूरा पर्वतीय समाज भावनात्मक रूप से जुड़ा है। इसके अलावा इस क्षेत्र में पिछली ४५ पीढिय़ोंं से कई परिवारोंं की रोजी-रोटी भी बदरीनाथ के आशीर्वाद से ही चलती है। सातवीं सदी में जब आदि शंकराचार्य ने मठ का निर्माण किया और निर्वाण प्राप्त किया तब से दक्षिण भारत से लेकर गंगा-यमुना तक का हिंदु सनातनी बदरीनाथ में मोक्ष कमाने की मनसा से आता रहा है। इस धार्मिक स्थल के कारण पूरे भारतीय समाज में ही नहीं विदेशों में भी उत्तराखंड की अपनी विशेष प्रतिष्ठïा सदियों से बनी हुई है। इन्हीं स्थलों के कारण हिमालय की गोद मेंं बसी इस भूमि को देवभूमि का दर्जा भी मिला है।
साल में छह महीने तक चलने वाली चारधाम यात्रा २७ अप्रैल से शुरू हो चुकी है और इस बार भक्तजन १७ अक्तूबर तक बदरीनाथ के दर्शन कर सकेंगे। करीब दस लाख श्रद्धालु प्रतिवर्ष इस यात्रा के लिए देवभूमि पधारते हैं। तीर्थ के रास्तों में पडऩे वाले हिमशिखरों, पर्वतों, घाटियों और नदियोंं का भी विशेष महत्व है। अलकनंदा, भागीरथी, पिंडर, नंदाकिनी, मंदाकिनी आदि नदियों के मिलाप स्थल इस यात्रा मार्ग पर पांच प्रयागों का निर्माण कर यात्रा को और पवित्र कर श्रद्धालुओं को असीम शांति देते हैं। पांच प्रयागों में देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और विष्णुप्रयाग इस यात्रा के महत्वपूर्ण बनाते हैं। यात्रा केदौरान आदि बदरी के आसपास स्थित ध्यान बदरी, योग बदरी, भविष्य बदरी और विशाल बदरी की भी अपनी प्रसिद्धि है। गढ़वाल क्षेत्र में यह पंच बदरीनाथ के नाम से विख्यात हैं और यहां पुरुष सूक्त का पाठ किया जाता है। माना जाता है कि पुरुष सूक्त के निर्माता ऋषि नारायण इस आश्रम मेंं रहे थे। यह सारा वातावरण सदियोंं से ऋषियोंं, मनीषियोंं, अध्येताओं, तीर्थयात्रियोंं को न सिर्फ आकर्षित कर रहा है बल्कि उनके अनुभवों को दिव्यता और भव्यता भी प्रदान कर रहा है। पर पिछले कुछ वर्षों मेंं इसकी यही अलौकिकता इसके दोहन का प्रमुख कारण बन गई है।
आज क्षेत्र मेंं विकास केनाम पर भारी-भरकम मशीनीकरण और अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप बढ़ा है। जमीन के कारोबारियों और निजी निवेशकोंं ने पैसा कमाने की चाहत में इन पर्वतों, नदी-घाटियोंं को खोखला करने में कोई कसर नहींं छोड़ी है। इसी का परिणाम है कि वरुणावत जैसे पर्वत रूक-रूक कर ही सही अपना रौद्र रूप दिखाकर भयावह परिणामों का संकेत दे रहे हैं। प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ का ही नतीजा है कि गढ़वाल हिमालय का गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष २५ मीटर की रफ्तार से घट रहा है। बदरीनाथ क्षेत्र पहले ही दैविय आपदा और भूकंप की दृष्टिï से देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल किया जा चुका है। सीमा सड़क संगठन, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, रुड़की इंजीनियरिंग और भारतीय अनुसंधान संगठन के साथ ही अन्य संस्थान समय-समय पर इस क्षेत्र का भूगर्भीय अध्ययन करते रहते हैं। इसरो के रिमोट सेंसिग और भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग द्वारा पिछले वर्ष तैयार भूस्खलन हैजर्ड मैपिंग मेंं यात्रा मार्ग पर ४४१.५७ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित है। इसकेअलावा हाल ही मेंं आईआईटी रुड़की द्वारा किए अध्ययन से भी खतरनाक संकेत मिलते हैं। आईआईटी ने ऋषिकेश से रुद्रप्रयाग तक १३३ किलोमीटर मार्ग का सर्वेक्षण किया इसमें ४० किमी हिस्सा दुर्घटना के लिहाज से बेहत संवेदनशील है। इस ४० किमी के क्षेत्र मेंं कम चौड़ाई वाले तीव्र मोड़ हैं जो पहाड़ोंं पर दुर्घटना का सबसे बड़ा कारण हैं। इसके अलावा सड़क केकिनारे रेलिंग्स, दिशा चिन्ह, संड़क पर सेंटर लाइन और खतरे केनिशानों तक का अभाव है। यह कमियां यात्रा को और जटिल बनातीं हैं।
यात्रा को सुगम बनाने के लिए सड़क चौड़ा करने का काम शुरू होने के बाद खतरा और बढ़ा है। विस्फोटकों के इस्तेमाल से चट्टïानें कमजोर हुईं हैं। इसकेअलावा जल विद्युत परियोजनाओंं केलिए बन रही सुरंगोंं ने पहले से ही अपरिपक्व पहाड़ों को और नाजुक कर दिया है। चारधाम यात्रा मार्ग की हालत खस्ता है। उत्तराखंड पुलिस ने इस मार्ग पर ३०० से अधिक ऐसे बिंदु चिन्हित किए हैं जो दुर्घटना की दृष्टिï से बेहद संवेदनशील हैं। यह खतरे उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग और पौड़ी में हैं। हाईवे पर बनीं पुलियाओंं की हालत भी नाजुक है। इसमेंं कई पुलिया तो ऐसी हैं जिन्हें बिल्कुल नए सिरे से निर्माण की आवश्यकता है इसका प्रस्ताव भी केंद्र सरकार के पास लंबित पड़ा है। आवाजाही तो इनमें चल रही है लेकिन भारी वाहन का वजन सहन अब इनके बस की बात नहीं और कभी भी कोई बढ़ी दुघर्टना घट जाए तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। इसी खस्ताहाल मार्ग पर अब तक सैकड़ों यात्री अपने प्राण गंवा चुके हैं। २००८ मेंं ही यहां १३९ लोगोंं की जान गई जबकि १२९ लोग गंभीर रूप से घायल हुए। २००३-२००४ में इस मार्ग पर ७७ दुर्घटनाएं हुईं। २००४-२००५ मेंं यह संख्या ८५ पर पहुंच गई जबकि २००६-२००७ मेंं यह आंकड़ा १०० के पार चला गया। सराकारी आंकड़ों के मुताबिक इन दुर्घटनाओंं मेंं करीब १००० आदमी मारे गए और २००० गंभीर रूप से घायल हुए। यह केवल यात्रा सीजन का आंकड़ा है। वरन तो पहाड़ पर सड़क दुर्घटना अब आम बात है।
बदरीनाथ धाम केपर्यावरणीय जानकार बताते हैं कि स्कंधपुराण मेंं इस क्षेत्र का वर्णन गंगा मधान क्षेत्र के रूप में किया गया है। हाल केसालोंं मेंं यहां दुर्लभ जड़ी-बुटियों और पेड़ पौधोंं का अस्तित्व था जो अवैज्ञानिक निर्माण की भेट चढ़ गया। यहां की पर्वतमालाएं ग्लोबल वार्मिंग से जुझ रहीं हैं कभी चांदी की तरह चमकने वाले इन पहाड़ों पर कालिख भी दिखने लगी है। पर इसकी तरफ किसी का ध्यान नहींं जाता। सारा ध्यान यात्रियोंं की अधिक आमद और अंधी कमाई पर रहता है। यात्रा पर आने वाले मेहमानों और स्थानीय आबादी की खुशहाली को तपोस्थलोंं से जोडऩे की पहल कहींं नजर नहीं आती। यदि हम अब भी न चेते और भगवान बदरीनाथ ने स्वयं अपना रूप बदल लिया तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

राजीव पाण्डेय, देहरादून
9411348180

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