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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

गंगा और खाली गागर

राजीव पांडेय
जिस गंगा की गोद से अभी-अभी करोडों लोग अपने पाप धोकर निकले हैं वहां आज भी प्यास पसरी है; गंगा की जन्मस्थली गंगोत्री गलेश्यिर के ठीक नीचे कई गांव में लोग पानी खरीद कर पी रहे हैं; उखीमठ जैसे कई क्षेत्र हैं जहां लोगों को जलाभिषेक तक के लिए पानी नहीं मिल रहा है; पानी के लिए दर-दर भटक रहे लोग आए दिन जलसंस्थान और जलनिगम से गुहार लगा रहे हैं; उत्तराखंड के पुरूष पानी के लिए धरने-प्रदर्शन और गांधीगिरी तक कर रहे हैं; महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे दिन भर पानी ढो रहे हैं; यही हालात कुमाउं के डीडीहाट, गंगोलीहाट, चंपावत और पिथौरागढ के है; यह स्थिति तब है जब दिल्ली में बैठे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री मिनरल वाटर पीने के बाद देश की 86 प्रतिशत आबादी को शुद्ध पानी उपलब्ध करा देने का दावा कर रहे हैं;
राज्य में लगातार गहरा रहे जल संकट का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 30 जून तक जलसंस्थान और जलनिगम के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की छुट्टियां निरस्त कर दी गई हैं; हालांकि अब तक सरकार गरमियों में होने वाले पेजजल संकट की राह तक रही थी; इसी का परिणाम है कि अभी तक इस समस्या से निपटने के लिए हुए इंतजाम सिफर हें; कुमाउं और गढवाल की अधिकांश पेयजल योजनाएं प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर हैं; प्राकृतिक जलस्रोत वनों के अंधाधुंध दोहन के कारण जवाब दे चुके हैं; सबसे अधिक नुकसान चौडी पत्ति वाले पेड काटने के कारण हुआ; जिससे जमीन के भीतर पानी संग्रहित नहीं हो पा रहा है; जिसका परिणाम गरमियों में यह समस्या और विकराल होकर उभर रही है;
आंकड बताते हैं कि 13 जिलों वाले इस राज्य में पौडी, टिहरी, चमोली, बागेश्वर, पिथौराढ, अल्मोडा, रूद्रप्रयाग और चंपावत में करीब 5 लाख की आबादी को पानी के लिए गरमियों में ही नहीं सर्दियों में भी कडी मशक्कत करनी पडती है; आबादी का एक बडा हिस्सा तीन से सात किमी दूर से पानी ढोने के लिए मजबूर है; पहाड में स्थिति और भी भयावह है; पिथौरागढ में गंगोलीहाट तहसील की बेलपट्टी से लेकर चकराता के उदावा गांव तक लोग गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं; इन गांवों में डायरिया कई बार लोगों को मौत की नींद सुला चुका है लेकिन प्रशासन की नींद अभी तक नहीं टूटी;
अपनों पर सितम तो शासन-प्रशासन की आदत है; अब बारी है देवभूमि में तिर्थ को आने वालों की; चारधाम और कैलास मानसरोवर जैसी महत्वपूर्ण तिर्थयात्राएं हमारे सामने हैं; लेकिन तैयारी के नाम पर आश्वासन और दावो के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा है; यात्रामार्ग पर लगी पानी की टंकियां सूखी पडी है; इनमें पानी आए भी तो कहां से; गढवाल मंडल में लगे करीब 4000 हैंडपंपों में से अधिकांश ने हाथ खडे कर दिए हैं; कुछ हैंडपंप पानी के साथ बीमारी भी उडेल रहे हैं;

4 टिप्‍पणियां:

  1. बुट्रोस बुट्रोस घाली : भविष्य की लड़ाइयाँ पानी पर ही लड़ी जायेंगी

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  2. hello, shekhar
    tumhara cooment mila accha laga, comment to milte rahte hai lekin jab koi yooth karta hai to behad accha lgata hai. contect mai bane rahna.

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  3. rajiv bhai pahad ki yah pida hamre INTAR NATINOL prayavarn-vrdon ko keun nahi dikhai dati.aaj desh ko aap jashe nojawanon ke jajbe ki jarurat hai.
    ek bhadhiya lekh ke liya badahi.

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