घराटों को लेकर विश्वव्यापी चिंतन
बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं से उपजी विस्थापन की पीड़ा को कम करने के लिए घराटों (पनचक्की) के संरक्षण की मुहिम तेज हो गई है। भारी जन दबाव के चलते ही सही सरकार ने इनके उन्नयन केलिए काम शुरू कर दिया है। उत्तराखंड में ही अब तक 700 से अधिक घराटों का आधुनिकीकरण किया जा चुका है। इसमें कई ऐसे घराट भी शामिल हैं जिनकी बिजली से सुदूर बसने वाले कई गांवों मेंं आज बल्ब टिमटिमा रहे हैं। यह ऐसे गांव हैं जहां हाल-फिलहाल तो हाईटेंशन लाइन के माध्यम से बिजली पहुंचाना आसा नहीं था। इसके अलावा इन घराटों ने स्थानीय लोगों में रोजगार की भी एक उम्मीद जगाई है। इसी उम्मीद को देखते हुए संयुक्त राष्टï्र संघ की बॉडी, यूनाइटेड नेशन इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन, भारत सरकार और उत्तराखंड में घराटों के संरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रही संस्था हैस्को ने फरवरी 2010 में घराटोंं के आधुनिकीकरण को तेज करने के लिए एक सेमिनार आयोजित किया है।
इस आयोजन का मुख्य उद्ेश्य घराटों का संरक्षण कर ग्लोबल वार्मिंग के असर और विस्थापन के दर्द को कम करना है। 80 के दशक मेंं औद्योगिक विकास की गति तेज होने के साथ ही घराटों का अस्तित्व खतरे मेंं पड़ गया था। दूसरी शताब्दी के आसपास घराट तब अस्तित्व मेंं आए जब मानव के सामने अनाज उगाने की कला विकसित करने के बाद इसे खाने लायक बनाने की चुनौती थी। इसी केचलते घराटों का निर्माण हुआ और यह लोक विज्ञान का पहला आविष्कार था। पत्थर के साथ लकड़ी को बांधकर पानी की धार से चलने वाले इस उपक्रम को पानी पर आधारित पहला उद्योग भी कहा जा सकता है। ब्रिटिश काल मेंं एक दौर ऐसा भी था जब घराटों से होने वाली आय से गांव मेंं शिक्षकोंं को वेतन दिया जाता था। साथ ही गांव के कई विकास कार्यें में भी इससे होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा लगता था।
पर 1980 में बड़े पैमाने पर नदी घाटी परियोजनाएं अस्तित्व में आईं। इनके सामने घराट प्रतियोगी रूप से सफल नहीं थे जिसके चलते इन्हें प्रचलन से बाहर होना पड़ा और अब तक इसके सहारे आजीविका चला रहे लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ। बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के बनने से देश के महानगर तो जरूर रोशन हुए पर जिन ग्रामीणों की कीमत पर यह परियोजनाएं बनी उन्हें केवल विस्थापन ही मिला। इसी के चलते आजादी से अब तक जल विद्युत परियोजनाओं के कारण करीब 3 करोड़ 50 लाख लोगों को विस्थापन का दर्द सहना पड़ा। इसी का परिणाम था कि तिनका-तिनका जोड़कर बना टिहरी का ऐतिहासिक शहर उत्तराखंड के नक्शे से गायब हुआ। साथ ही एक लाख लोगों को अपनी जन्मभूमि छोडऩी पड़ी। नर्मदा में बने सरदार सरोवर बांध में 245 गांव डूबे। इसमें 33 गांव महाराष्टï्र के, 193 गांव मध्यप्रदेश के और 19 गांव गुजरात के शामिल थे जिनका नामोनिशान मिट चुका है और इन गांवों में बसने वाले लाखों लोग देश में ही बिखरे हुए है। यदि अब उत्तराखंड में प्रस्तावित पंचेश्वर बांध अस्तित्व में आता है तो करीब 40,000 लोग और विस्थापित होंगे इसमें नेपाल और भारत दोनों ही देशों के बाशिंदे शामिल हैं। विस्थानपन की यह पीड़ा केवल भारत मेंं ही नहीं विश्व के अन्य देशों मेंं भी है। इसी कारण अब इसके विकल्प के रूप में छोटी जल विद्युत परियोजनाओं को देखा जा रहा है जिसमें घराट भी शामिल है। घराटोंं को लेकर यूरोप, अफ्रीका, केन्या, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका मेंं भी चिंतन का दौर जारी है।
पहाड़ी राज्यों मेंं घराटों का अस्तित्व आज भी बचा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड मेंं वर्तमान मेंं 13000 घराट हैं। जबकि एक समय इनकी संख्या 70 हजार के आसपास थी। हिमाचल और जम्मूकश्मीर में भी घराटों की संख्या अच्छी खासी है। उत्तराखंड मेंं घराटोंं को लेकर चिंतन सही मायनोंं मेंं 90 के दशक मेंं शुरू हुआ। जब घराटों के संरक्षण को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए लोगों ने पद यात्राएं निकालनी शुरू कीं। इसी दबाव से सरकार चेती और 1994 में घराटों के उन्नयन की मुहिम सरकारी स्तर पर शुरू हुई। 1999 में सरकार ने इसे उद्योग का दर्जा दे दिया।
इसके बाद आईआईटी और अन्य संस्थान इस तकनीक को विकसित करने में लग गए। पर इन संस्थानोंं का तरीका परंपरागत तरीके से अलग था। इसमें गांव के लोगों से कोई मशविरा नहींं हुआ जो दूसरी शताब्दी से ही घराट का संचालन करने के साथ ही इसके संरक्षण में लगे थे। इस कारण आईआईटी और अन्य संस्थानोंं ने जो तकनीक विकसित की वह महंगी होने के साथ ही ग्रामीणों के अनुसार काफी कठिन भी थी। इन संस्थानोंं द्वारा बनाए गए घराटों के खराब हो जाने पर ग्रामीणों के पास इसका कोई उपचार नहीं था। इस समस्या से निपटने के लिए और सरकार से अपने माफिक घराट बनवाने को लेकर 1994 में चमोली के गडोरा गांव में पहला घराट संगठन बना। हालांकि अब सरकार ने उत्तराखंड केप्रत्येक जिले में घराट समितियां बना दी हैं। इसके बाद उत्तराखंड में लघु जल विद्युत परियोजना बनाने केकाम में लगे उरेडा ने भी ग्रामीण स्तर पर बने इन संगठनोंं की बात को मानते हुए इस तकनीक को सस्ता और सरल बनाने की कोशिश की है। जम्मूकश्मीर में जयेडा तथा हिमाचल में हिम ऊर्जा यह काम कर रहे हैं। जम्मूकश्मीर में तो सेना भी इस काम में सहयोग कर रही है। नेपाल और श्रीलंका से सीख लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने भी लघु जल विद्युत परियोजनाओं के प्रति अपना रुझान प्रदर्शित करने के लिए एक मेगावाट तक की परियोजनाओं को लाइसेंस मुक्त कर दिया। जबकि नेपाल में यह प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो चुकी है। भारत की सीमा से लगे नेपाल के अनेक गांवों के लोग जरूरत के मुताबिक बिजली बना रहे हैं जिससे सुदूर पहाड़ों पर बसे गांव तो रोशन हुए ही हैं साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है। इसके बाद विस्थापन का दर्द की बहुत हद तक कम हुआ है। यह सब हुआ सैकड़ों वर्षों से मौजूद घराटों के आधुनिकीकरण से।
राजीव पांडेय

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें